कसौली रेप केस: कोर्ट ने कहा- जांच को आगे बढ़ाना कानून का दुरुपयोग, पुलिस की जांच पर जताई संतुष्टि

Edited By Manisha rana, Updated: 21 Jan, 2026 09:44 AM

kasauli case court says pursuing investigation is misuse of law

कसौली रेप केस में दूसरी बार क्लीनचिट पाए हरियाणा भाजपा अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली और सिंगर रॉकी मित्तल के मामले में कोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम खुलासे किए हैं।

चंडीगढ़ : कसौली रेप केस में दूसरी बार क्लीनचिट पाए हरियाणा भाजपा अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली और सिंगर रॉकी मित्तल के मामले में कोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम खुलासे किए हैं। कसौली कोर्ट के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट अशोक कुमार ने अपने 20 पेज के फैसले में शिकायतकर्ता के तमाम आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। 

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में आगे जांच की जरूरत नहीं, ऐसा किया तो कानून का दुरुपयोग होगा। साथ ही कोर्ट ने कहा कि शिकायत कर्ता की ओर से जो विरोध याचिका दाखिल की गई है वह भी कानून के पटल पर सक्षम नहीं है और उसे खारिज किया जाता है। इन आदेशों के साथ कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को मंजूर करते हुए केस बंद करने के आदेश दिए हैं। वहीं क्लोजर रिपोर्ट में पुलिस ने शिकायतकर्ता युवती के खिलाफ कई गंभीर खुलासे किए हैं।

पुलिस ने रेप का केस करने वाली युवती पर मैडीकल न करवाने के अलावा मुकद्दमे में देरी, प्रत्यक्षदर्शी की गवाही सहित करीब 8 खलासे किए हैं। हर खुलासे का कारण क्लोजर रिपोर्ट में पुलिस ने दाखिल किया है। बता दें कि इससे पहले भी कसौली कोर्ट में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट पुलिस ने दाखिल की थी, जिसको कसौली कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। इसके बाद रेप पीड़िता ने इसे चुनौती दी थी। जिला कोर्ट ने ही कसौली कोर्ट को फिर से महिला का पक्षा सुनने के आदेश दिए थे। बीते 8 जनवरी को कसौली कोर्ट ने पुलिस की दूसरी क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर सभी आरोपों को खारिज कर केस बंद कर दिया है।

पुलिस ने कहा, केस दर्ज करवाने में 18 महीने की क्यों हुई देरी: कोर्ट में दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट में कहा गया कि कथित पीडिता ने अपने साथ हुए दुष्कर्म के बारे म पुलिस को सूचित करने और मुकद्दमा दर्जी करवाने में 18 महीने की देरी की है। ऐसे में यह मामला संदिग्ध माना जाना चाहिए। इसके अलावा पुलिस के बार-बार कहने पर भी पीड़िता ने अपना मैडीकल परीक्षण करवाने से इंकार कर दिया। उसने परीक्षण के लिए अपनी सहमति नहीं दी ऐसे में मामला संदिग्ध माना जाता है कि दुष्कर्म हुआ है या नहीं? रिपोर्ट में कहा गया है कि दुष्कर्म के मामलो में मैडीकल जांच ही आरोप साबित करने का मुख्य आधार होती है।

साथी महिला ने किया दुष्कर्म से इंकार

कोर्ट में शिकायकर्ता ने यह तर्क दिया था कि जांच पक्षपातपूर्ण और अधूरी है। जबकि इस मामले की केस डायरी से पता चलता है कि होटल के कर्मचारियों और अन्य मेहमानों सहित महत्वपूर्ण गवाहों के बयान पुलिस द्वारा दर्ज किए गए है। होटल का रिकॉर्ड एकत्र किया गया है और शिकायतकर्ता तथा उसके साथियों से पूछताछ की गई है, जिसमें उसकी साथी महिला ने भी दुष्कर्म से इंकार किया।

रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि शिकायतकर्ता का बाँस उसी होटल के दूसरे कमरे में मौजूद था। यह स्वीकार किया गया है कि बॉस घटना के दौरान दूसरे कमरे में टहरा हुआ था। यह भी स्वीकार किया गया है कि उसने शाम या रात के किसी भी समय शिकायतकर्ता को ढूंढने या उनके बारे में कोई पूछताछ करने का प्रयास नहीं किया। यदि इतनी गंभीर घटना घटी होती और शिकायतकर्ता संकट में होती तो घटना के दौरान या उसके तुरंत बाद बॉस की ओर से कुछ प्रतिक्रिया या कार्रवाई की उम्मीद की जाती। इस पहलू पर पूरी तरह से चुप्पी और निष्क्रियता शिकायतकर्ता के बयान को और कमजोर करती है। शिकायतकर्ता और उसके साथियों का कसौली आकर शिकायत दर्ज करवाने के बाद वहां रुकना भी संदेह पैदा करता है।

रिपोर्ट में लिखा है कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि शिकायतकर्ता अपने साथियों के साथ काफी समय तक यहां रुकी रही। उन्होंने समय लिया और जांच के अनुसार घटनास्थल के रूप में कमरा नंबर 226 की पहचान 16 दिसम्बर 2025 को, काफी समय बाद और तब हुई जब उनके एक साथी ने खुद उस होटल के कमरे में ठहरकर इसकी पुष्टि की। रिपोर्ट में पुलिस ने लिखा है कि एफ. आई. आर. और बयानों को ध्यानपूर्वक पढने पर ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं है कि शिकायतकर्ता या पूनम को शारीरिक बल का प्रयोग करके नशीले पेय पदार्थ जबरदस्ती पिलाए गए हों। शिकायतकर्ता ने कहा है कि पेय पदार्थ पेश किए गए और उसे पीने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन रिकॉर्ड में हिंसा या जबरदस्ती जैसे किसी भी प्रत्यक्ष कत्य का खलासा नहीं होता है।

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