Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 10 Sep, 2026 06:03 AM

हरियाणा राज्य सतर्कता और भ्रष्टाचार-रोधी ब्यूरो (एसीबी) ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) में करोड़ों रुपये कीमत के प्लॉट के अवैध हस्तांतरण के खेल का बड़ा पर्दाफाश किया है।
गुड़गांव, (ब्यूरो): हरियाणा राज्य सतर्कता और भ्रष्टाचार-रोधी ब्यूरो (एसीबी) ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) में करोड़ों रुपये कीमत के प्लॉट के अवैध हस्तांतरण के खेल का बड़ा पर्दाफाश किया है। 30 साल पुराने प्लॉट आंवटन मामले में करोड़ों रुपये के राजस्व को नुकसान हुआ था।
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सात साल तक चली जांच के बाद मामले में एसीबी ने गुरुग्राम पुलिस स्टेशन में नौ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। नामजद आरोपियों में एचएसवीपी के तत्कालीन मुख्य प्रशासक डॉ सुरेश कुमार, पूर्व संपदा अधिकारी मुकेश कुमार,सहायक कृष्ण कुमार, क्लर्क हनुमान सिंह के अलावा कारोबारी एसके खोसला, सतवीर सिंह मलिक, अभय सहारन, राम निवास राठी और वशिष्ठ कुमार गोयल शामिल हैं। आरोपियों पर आईपीसी की धाराओं 120बी, 409, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
जानकारी के मुताबिक, मामला सेक्टर 23-23ए स्थित प्लॉट नंबर 4377 (क्षेत्रफल 500.64 वर्ग गज) से जुड़ा है, जो मूल रूप से 1988 में एसके खोसला की एक फर्म को छह लाख 74 हजार रुपये में अलॉट किया गया था। अलॉटमेंट के समय केवल 10 फीसदी राशि जमा की गई थी। बार-बार नोटिस देने के बावजूद बकाया राशि जमा न कराने पर एचएसवीपी ने 8 अप्रैल 2002 को इस प्लॉट का अलॉटमेंट रद्द कर इसे वापस ले लिया था। इसके बावजूद आरोपी खोसला ने 2003 में अभय सहारन के नाम इस ज़ब्त प्लॉट की जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) बनवा दी, जिसमें राम निवास राठी गवाह बने। बाद में यह प्रॉपर्टी सतवीर सिंह मलिक को ट्रांसफर कर दी गई।
जांच में खुलासा हुआ कि खोसला के ही एक अन्य प्लॉट नंबर 4358 की पूरी रकम समय पर जमा हो चुकी थी, लेकिन रिकॉर्ड में गड़बड़ी के कारण उसे भी रद्द कर दिया गया था, जिसे बाद में कंज्यूमर फोरम ने बहाल करने का आदेश दिया था। अधिकारियों ने जानबूझकर प्लॉट नंबर 4377 और 4358 के केस को एक जैसा दर्शाया, जबकि प्लॉट 4377 डिफ़ॉल्ट का मामला था। क्लर्क हनुमान सिंह और सहायक कृष्ण कुमार ने गलत नोट तैयार किया, जिसे संपदा अधिकारी मुकेश कुमार ने मंज़ूरी देकर आगे बढ़ाया। आखिरकार तत्कालीन मुख्य प्रशासक डॉ. सुरेश कुमार ने एक मार्च 2019 को दोनों मामलों को एक समान मानते हुए रद्द प्लॉट की ज़ब्ती को गैर-कानूनी तरीके से निरस्त कर दिया।
इस पूरे घोटाले से सरकारी खजाने को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया। साल 2019 में इस प्लॉट की कलेक्टर-रेट वैल्यू ही एक करोड़ 75 लाख रुपये थी, जबकि वास्तविक बाजार मूल्य करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये था। इसके बावजूद इसकी कन्वेयंस डीड केवल 6.71 लाख रुपये में दिखा दी गई। यह पूरा मामला सेवानिवृत पुलिस अधिकारी सतेंद्र कुमार द्वारा एसपी की देखरेख में की गई गहन विजिलेंस जांच का नतीजा है।विजिलेंस की सिफारिशों और हरियाणा के मुख्य सचिव द्वारा फरवरी 2026 में मुकदमा चलाने की मंजूरी दिए जाने के बाद अगस्त 2026 को एसीबी पुलिस स्टेशन में आधिकारिक रूप से मामला दर्ज किया गया। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की विस्तृत जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी को सौंपी गई है, जिसमें कई अन्य अधिकारियों और बिचौलियों पर भी गाज गिर सकती है। जांच अधिकारी ने बताया कि मामले में जांच चल रही है और जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।