बंसीलाल और ओमप्रकाश चौटाला जैसे मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में मंत्री पद ठुकरा चुके हैं अनिल विज

Edited By Isha, Updated: 05 May, 2026 01:54 PM

anil vij has declined ministerial posts

हरियाणा की राजनीति में कुछ चेहरे सिर्फ पदों से नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों और अडिग प्रतिबद्धता से पहचाने जाते हैं। अनिल विज ऐसा ही एक नाम हैं, जिन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में

चंडीगढ़(  चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा की राजनीति में कुछ चेहरे सिर्फ पदों से नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों और अडिग प्रतिबद्धता से पहचाने जाते हैं। अनिल विज ऐसा ही एक नाम हैं, जिन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में विचारधारा को सर्वोपरि रखा—चाहे इसके लिए उन्हें 14 वर्षों का कठिन “वनवास” ही क्यों न झेलना पड़ा हो।
निर्दलीय विधायक रहते हुए भी बंसीलाल और ओमप्रकाश चौटाला जैसे मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में मंत्री पद ठुकराना कोई सामान्य बात नहीं। लेकिन अनिल विज ने यह कर दिखाया। सत्ता का आकर्षण उनके सिद्धांतों को कभी डिगा नहीं सका। यही कारण है कि वे आज भी अपने समर्थकों के बीच एक “विचारधारा के योद्धा” के रूप में स्थापित हैं।
हाल के दिनों में उनकी एक पुरानी तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। यह तस्वीर केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अनुभव, अनुशासन और भविष्य की वैचारिक नींव का प्रतीक बनकर उभरी है।

अनिल विज का संघ से जुड़ाव कोई राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा रही है, जिसकी शुरुआत उनके छात्र जीवन (1969-70) में हुई। करनाल के संघ संचालक प्रोफेसर गोपाल कृष्ण के संपर्क में आकर उन्होंने पहली बार शाखा में कदम रखा। यहीं से राष्ट्र सेवा की वह भावना जागी, जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा तय कर दी। जल्द ही उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में जिम्मेदारी मिली और वे संगठनात्मक कार्यों में गहराई से सक्रिय हो गए।

1974 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी मिलने के बाद भी उनका समर्पण कम नहीं हुआ। नौकरी के साथ-साथ वे छुट्टियां लेकर संघ, एबीवीपी और जनसंघ के कार्यक्रमों में भाग लेते रहे। आपातकाल के बाद चुनावी अभियानों में उनकी सक्रियता और 1987 में सुषमा स्वराज की जीत में उनकी भूमिका ने उन्हें संगठन के भरोसेमंद कार्यकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया।

1990 का अंबाला छावनी उपचुनाव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना। जब संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में उन्हें आदेश दिया कि “सुबह इस्तीफा देकर चुनाव लड़ो”, तो उन्होंने बिना हिचक आदेश का पालन किया। यह सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं था, बल्कि एक कार्यकर्ता का संगठन के प्रति पूर्ण समर्पण था। उन्होंने चुनाव जीतकर उस धारणा को तोड़ा कि उपचुनाव केवल सत्ता पक्ष ही जीत सकता है।

हालांकि इसके बाद उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी निष्ठा और संगठनात्मक क्षमता के चलते उन्हें भाजपा युवा मोर्चा की जिम्मेदारी दी गई। फिर 1995 में एक अप्रत्याशित मोड़ आया, जब संघ के निर्देश पर उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। बिना कारण जाने भी आदेश का पालन करना उनकी अनुशासनप्रियता का प्रमाण था।
इसके बाद 14 वर्षों का लंबा अंतराल आया—एक तरह का राजनीतिक वनवास। लेकिन इस दौरान भी उन्होंने न तो विचारधारा बदली, न ही किसी अन्य दल का दामन थामा। 1996 और 2000 में निर्दलीय चुनाव जीतकर उन्होंने साबित किया कि जनता का विश्वास किसी पार्टी का मोहताज नहीं होता।

2009 में उनकी भाजपा में वापसी भी किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं थी। दिल्ली में बैठे-बैठे टीवी पर खुद को टिकट मिलता देख वे खुद भी हैरान रह गए। बाद में औपचारिक सदस्यता लेकर उन्होंने फिर से पार्टी में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाई। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस पूरे दौर में उन्होंने सत्ता के कई आकर्षक प्रस्ताव ठुकराए। बंसीलाल और चौटाला—दोनों ने उन्हें मंत्री पद का ऑफर दिया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

आज अनिल विज अंबाला छावनी से सात बार विधायक रह चुके हैं और लंबे समय से हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में सक्रिय हैं। उनका राजनीतिक जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे, तो परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अंततः पहचान और सम्मान दोनों मिलते हैं। अनिल विज की कहानी केवल एक नेता की नहीं, बल्कि विचार, अनुशासन और समर्पण की उस राजनीति की है, जो आज के दौर में दुर्लभ होती जा रही है।


 

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