राष्ट्रीय डॉटर्स नेमप्लेट दिवस: एक नेमप्लेट से शुरू हुआ अभियान, आज लाखों बेटियों के सम्मान का प्रतीक

Edited By Harman, Updated: 04 Jul, 2026 06:34 PM

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आज देशभर में राष्ट्रीय डॉटर्स नेमप्लेट दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस केवल एक अभियान का उत्सव नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक है जिसने बेटियों की पहचान, सम्मान और अधिकारों को घर की चौखट से जोड़ने का साहसिक प्रयास किया।

चंडीगढ़ : आज देशभर में राष्ट्रीय डॉटर्स नेमप्लेट दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस केवल एक अभियान का उत्सव नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक है जिसने बेटियों की पहचान, सम्मान और अधिकारों को घर की चौखट से जोड़ने का साहसिक प्रयास किया।

आज से ठीक ग्यारह वर्ष पूर्व, 5 जुलाई 2015 को हरियाणा के बीबीपुर गांव में सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन के संस्थापक एवं गांव के पूर्व सरपंच सुनील जागलान ने अपनी बेटी नंदिनी जागलान के नाम की नेमप्लेट अपने घर के बाहर लगाकर एक नई सामाजिक सोच की शुरुआत की थी। उस दिन लगाया गया एक छोटा-सा नामपट्ट आज देश और सीमाओं के पार तक फैल चुके जनआंदोलन का आधार बन चुका है।

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पिछले ग्यारह वर्षों में इस अभियान के माध्यम से दो लाख से अधिक घरों के बाहर बेटियों के नाम की नेमप्लेट लगाई जा चुकी हैं। यह पहल अब नेपाल तक पहुंच चुकी है तथा अपनी विशिष्ट सामाजिक पहचान के कारण विकिपीडिया पर भी स्थान प्राप्त कर चुकी है।

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अभियान की शुरुआत आसान नहीं थी। रूढ़िवादी सामाजिक सोच, विरोध, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और कई स्थानों पर नेमप्लेट तोड़े जाने जैसी घटनाओं का सामना भी करना पड़ा। लेकिन सुनील जागलान अपने विश्वास पर अडिग रहे कि घर की पहचान केवल पुरुषों के नाम या गोत्र से नहीं, बल्कि बेटियों के नाम से भी होनी चाहिए। यही सोच आज हजारों परिवारों की मानसिकता बदलने का माध्यम बनी है।

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इस अभियान ने केवल घरों के बाहर नामपट्ट लगाने का कार्य नहीं किया, बल्कि बेटियों के सम्मान, संपत्ति के अधिकार और परिवार में समान पहचान को लेकर एक व्यापक सामाजिक संवाद खड़ा किया। हरियाणा के जींद, हिसार, नूंह, फतेहाबाद और पंचकूला से शुरू होकर यह अभियान उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र सहित अनेक राज्यों तक पहुंचा। नूंह जिले के किरूरी और भूतलाका गांव देश के पहले ऐसे गांव बने जहां प्रत्येक घर के बाहर बेटी के नाम की नेमप्लेट लगाई गई।

इस अभिनव पहल की सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी तथा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी कर चुके हैं। वर्ष 2017 से हरियाणा सरकार ने बेटी के जन्म पर घर के बाहर उसका नाम लिखने की पहल शुरू की। इसके बाद हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों ने भी इस विचार को अपनाया। राष्ट्रपति भवन द्वारा गोद लिए गए गांवों में भी यह अभियान आधिकारिक रूप से लागू किया गया।

सुनील जागलान ने कहा, “मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह है कि आज लोग स्वयं अपनी बेटियों के जन्म पर हमें फोन करके नेमप्लेट लगाने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह बदलाव बताता है कि समाज बेटियों को सम्मान और समान पहचान देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।”उन्होंने बताया कि अभियान के प्रारंभिक वर्षों में इसे ‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’, ‘लाडो स्वाभिमान उत्सव’ और ‘कुलज्योति’ जैसे नामों से भी आगे बढ़ाया गया। अब समय की नई चुनौतियों और सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस अभियान के एक नए स्वरूप को लॉन्च करने की तैयारी की जा रही है, जिससे बेटियों के अधिकारों और सम्मान के प्रति समाज में और अधिक सकारात्मक तथा भावनात्मक परिवर्तन लाया जा सके।

कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का विषय बन चुका यह अभियान तथा विकिपीडिया पर इसकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि एक गांव से शुरू हुआ छोटा-सा विचार आज वैश्विक पहचान प्राप्त कर चुका है।राष्ट्रीय डॉटर्स नेमप्लेट दिवस हमें यह संदेश देता है कि नेमप्लेट केवल एक पट्टिका नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और सामाजिक न्याय का प्रतीक है। जब किसी घर के बाहर बेटी का नाम लिखा जाता है, तब वह केवल उस घर की पहचान नहीं बदलता, बल्कि समाज की सोच को भी नई दिशा देता है। सुनील जागलान का कहना है कि 
“जिस दिन हर घर की चौखट पर बेटी का नाम सम्मान के साथ लिखा जाएगा, उसी दिन समाज में वास्तविक समानता की मजबूत नींव स्थापित होगी।”

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