Haryana Politics: हरियाणा के CM नायब सैनी मिले अमित शाह से, राज्यसभा चुनावों की रणनीति पर चर्चा

Edited By Isha, Updated: 22 Feb, 2026 08:35 PM

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हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की।चर्चा है कि हरियाणा में 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनावों के मध्यनजर यह मुलाकात काफी

चंडीगढ़(चंद्र शेखर  धरणी): हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की।चर्चा है कि हरियाणा में 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनावों के मध्यनजर यह मुलाकात काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हरियाणा में राज्यसभा की दो सीटें रिक्त हो रहीं हैं।भाजपा व कांग्रेस के विधायकों के गणित के आधार पर एक सीट भाजपा व एक सीट कांग्रेस की झोली में जाने की प्रबल राजनैतिक संभावनाएं हैं।अतीत में भी भाजपा दस वर्षों में कांग्रेस के विधायकों के गणित को फेल करके गेंद अपने पाले में ला चुकी है।इस बार भी बीजेपी अगर दो सीटों पर उम्मीदवार उतारती है तो परिणाम चौंकाने वाले रहने से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

राज्यसभा चुना में जून 2022 (पिछला चुनाव) जो 10-11 जून 2022 को हुआ में  हरियाणा से कुल 2 राज्यसभा सीटें थीं।भारतीय जनता पार्टी  के कृष्ण लाल पंवार ने पहली सीट जीत ली थी।दूसरी सीट पर *निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा जीते, जिनका समर्थन भाजपा ने हासिल किया।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन हार गए। इस चुनाव में भाजपा के पास हरियाणा विधानसभा में पर्याप्त संख्या विधायकों की थी। एक सीट भाजपा के पारंपरिक संख्याबल के कारण पक्की थी, लेकिन दूसरी सीट पर निर्दलीय (भाजपा-समर्थित) उम्मीदवार को जीत मिली क्योंकि कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी।हरियाणा के राज्यसभा चुनावों में  “पेन–स्याही” विवाद इससे पहले बड़े स्तर पर दर्ज नहीं हुआ था। 2022 की घटना को राज्य के राज्यसभा चुनावों का सबसे चर्चित प्रक्रियात्मक विवाद माना जाता है।

        

हरियाणा की राजनीति में वर्ष 2016 का राज्यसभा चुनाव बेहद चर्चित और नाटकीय घटनाक्रम के रूप में याद किया जाता है। 11 जून 2016 को हुए इस चुनाव ने यह साबित किया कि राज्यसभा का चुनाव केवल उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं, बल्कि विधानसभा के ठोस गणित और राजनीतिक प्रबंधन पर निर्भर करता है।

इस चुनाव में दो सीटों के लिए मतदान हुआ। प्रमुख उम्मीदवार थे:सुभाष चंद्रा निर्दलीय, लेकिन भाजपा समर्थित,आर के आनंद निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस का अधिकृत प्रत्याशी। विधानसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत था। यही बहुमत चुनाव की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। भाजपा के पास अपने विधायकों का मजबूत और संगठित समर्थन था। पार्टी ने सुभाष चंद्रा को समर्थन देकर चुनाव को रणनीतिक रूप से संचालित किया। दूसरी ओर, आर.के. आनंद निर्दलीय उम्मीदवार थे और उनके पास किसी बड़े दल का ठोस समर्थन नहीं था। विपक्षी खेमे में भी उस समय पूर्ण एकजुटता नहीं दिखी।

आर.के. आनंद संख्या बल की कमी थी। उनके पक्ष में पर्याप्त विधायक नहीं जुट पाए।यह चुनाव इसलिए चर्चित हुआ क्योंकि इसमें राजनीतिक प्रबंधन, क्रॉस वोटिंग की चर्चाएँ और संख्या बल का सीधा प्रभाव देखने को मिला।आर.के. आनंद की हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्यसभा चुनाव में व्यक्तिगत पहचान से अधिक महत्वपूर्ण होता है — विधानसभा का अंकगणित और दलों की रणनीतिक एकजुटता। 2016 का हरियाणा राज्यसभा चुनाव एक उदाहरण है कि किस प्रकार बहुमत, रणनीति और संगठनात्मक शक्ति चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं। आर.के. आनंद की पराजय केवल व्यक्तिगत हार नहीं थी, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और विधानसभा गणित का परिणाम थी।

 

यहाँ 2026 हरियाणा राज्यसभा चुनाव में विधायकों का गणित  विशेष रूप से राज्यसभा की दो सीटों के लिए हरियाणा विधान सभा में कुल 90 सदस्य विधायक हैं। (भाजपा): 48 विधायक, (कांग्रेस): 37 विधायक, 2 विधायक,निर्दलीय : 3 विधायक हैं। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 31 विधायक वोट देना जरूरी है। यदि कोई दल के पास 62 विधायक (दो सीटों के लिए 31×2) होते, तो वह दोनों सीटें ले सकता है, लेकिन हरियाणा में ऐसा नहीं है। भाजपा के पास 48 विधायक हैं।

48 ≥ 31, इसलिए भाजपा अपने एक उम्मीदवार को आसानी से जितवा सकती है। लेकिन दूसरी सीट के लिए भाजपा को: सहयोगी या निर्दलीय विधायकों का समर्थन चाहिए।फिलहाल कांग्रेस के 37 विधायक हैं, इसलिए भाजपा अकेले में दूसरी सीट नहीं जीत सकती (48 से 62 वोटों का समर्थन नहीं है)। 
 कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं।37 ≥ 31, इसलिए कांग्रेस भी अपने एक उम्मीदवार को जितवा सकती है, बशर्ते उसके विधायक पार्टी लाइन पर वोट दें।  राज्यसभा का चुनाव सिर्फ “मतदान” नहीं है — यह राजनीतिक संख्या-बल + रणनीति का खेल है। विधायक किस उम्मीदवार को वोट देते हैं, यह पार्टी बैठकों, अनुशासन और रणनीति पर निर्भर करता है। क्रॉस-वोटिंग (कभी-कभी विधायक अपने दल से अलग वोट देना) चुनाव के नतीजों को बदल सकता है — जैसा 2022 में हुआ था।

 

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