Edited By Harman, Updated: 29 Aug, 2026 05:17 PM
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल उनके पद से नहीं, बल्कि संगठन को खड़ा करने, चुनावी बिसात बिछाने और कार्यकर्ताओं में जीत का भरोसा जगाने की क्षमता से होती है।
दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल उनके पद से नहीं, बल्कि संगठन को खड़ा करने, चुनावी बिसात बिछाने और कार्यकर्ताओं में जीत का भरोसा जगाने की क्षमता से होती है। बिप्लब कुमार देब इसी पीढ़ी के अगुआ नेता हैं। बिप्लब की इस छवि का लाभ पार्टी को देशभर में मिलेगा। तेवरों में फायरब्रांड आक्रामकता, फैसलों में तीखापन और मैदान में आक्रामक रणनीति, इन तीनों के सटीक संतुलन ने उन्हें भाजपा के कद्दावर राष्ट्रीय नेताओं की कतार में ला खड़ा किया है। सबसे बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन सहित तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं में उनके प्रति विश्वास दिखाई देता है।
बिप्लब के प्रति यह विश्वास उनका पार्टी के प्रति समर्पण और उनके द्वारा किए गए राजनीति में किए गए लंबे संघर्ष का परिणाम है। त्रिपुरा में वामपंथी किले को ध्वस्त कर कमल खिलाने से लेकर दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिकाएं निभाने तक, उनका सफर राजनीतिक संघर्ष, प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक प्रबंधन की अनूठी मिसाल रहा है। बिप्लब देब राष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसे 'ट्रबलशूटर' और रणनीतिकार के रूप में उभरे हैं, जो केवल चुनावी अभियान की औपचारिकता नहीं निभाते, बल्कि अंतिम बूथ तक जीत की उम्मीद पैदा करते हैं।
त्रिपुरा की राजनीति दशकों से वामपंथी कैडर व्यवस्था और उनके अजेय सांगठनिक ढांचे के इर्द-गिर्द घूमती थी। भाजपा के लिए वहां न तो मजबूत धरातल था और न ही पर्याप्त संसाधन। ऐसे विषम माहौल में बिप्लब कुमार देब ने राज्य की कमान संभाली। उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक ढर्रे से हटकर ज़मीनी स्तर पर काम शुरू किया। कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार किया, बूथ स्तर पर इकाइयां गठित कीं और भाजपा को राज्य में एक सक्षम व मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में खड़ा किया।
2018 का त्रिपुरा विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज हुआ। बिप्लब देब के आक्रामक और सुव्यवस्थित नेतृत्व में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 25 साल लंबे कम्युनिस्ट शासन का अंत किया। इस ऐतिहासिक सफलता ने न केवल पूर्वोत्तर में भाजपा की पकड़ मजबूत की, बल्कि बिप्लब देब को एक राष्ट्रीय रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर दिया। त्रिपुरा में पार्टी की पहली सरकार बनाने और उसकी नींव मजबूत करने का श्रेय निर्विवाद रूप से बिप्लब देब को जाता है। हरियाणा, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में कार्यकुशलता से दिया सार्थक परिणाम
विपरीत परिस्थितियों में सटीक रणनीति का प्रदर्शन
बिप्लब देब की संगठनात्मक क्षमता और चुनावी चातुर्य की असली परीक्षा हरियाणा में हुई। हरियाणा विधानसभा चुनावों के दौरान प्रभारी और चुनाव सह-प्रभारी के रूप में उन्होंने संगठन को नई ऊर्जा दी। राज्य के जटिल सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय खींचतान और स्वाभाविक सत्ता विरोधी माहौल (एंटी-इनकम्बेंसी) के बीच भाजपा के लिए राह कतई आसान नहीं थी। ऐसे चुनौतीपूर्ण मोड़ पर उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान, नायब सैनी, सतीश पूनिया, सुरेंद्र नागर जैसे नेताओं के साथ माइक्रो-मैनेजमेंट पर ध्यान केंद्रित किया। बिप्लब देब का मुख्य फोकस शक्ति केंद्रों, मंडलों और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर रहा। वे खुद धरातल पर उतरे, कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित किया और स्थानीय मुद्दों को केंद्रीय रणनीति के साथ जोड़ा। नतीजतन, हतोत्साहित कैडर में यह विश्वास लौटा कि पार्टी मुकाबले में पूरी मजबूती से डटी है। हरियाणा में उनकी यह कार्यशैली साबित करती है कि वे केवल मंच से गरजने वाले वक्ता नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत को भांपकर रणनीति बनाने वाले माहिर प्रबंधक हैं।
उड़ीसा और पश्चिम बंगाल: कठिन भू-भागों में सांगठनिक विस्तार
बिप्लब देब के राष्ट्रीय कद की मजबूती उड़ीसा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव सह-प्रभारी के तौर पर मिली जिम्मेदारियों से भी साफ झलकती है। ये दोनों राज्य भाषाई, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं। यहां केवल केंद्रीय नारों के भरोसे टिकना संभव नहीं था। उड़ीसा में उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव के साथ जमीनी स्तर पर संगठन के विस्तार, स्थानीय नेताओं के बीच बेहतर समन्वय और बूथ प्रबंधन को प्राथमिकता दी। पश्चिम बंगाल में जहां का राजनीतिक माहौल बेहद आक्रामक और संघर्षपूर्ण रहा है, वहां उन्होंने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखा। सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव आदि नेताओं के साथ मिलकर विरोधियों के खिलाफ तीखे राजनीतिक अभियानों को धार दी और संगठन को हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार किया। अलग-अलग राजनीतिक परिवेश में रणनीति को जरूरत के हिसाब से ढालने की उनकी इस खूबी ने पार्टी नेतृत्व के बीच उनके भरोसे को और मजबूत किया।
'मेरी कुंडली में हार नहीं, बयान से कार्यकर्ताओं का जगाया आत्मविश्वास'
बिप्लब देब का एक बयान राजनीतिक गलियारों में अक्सर चर्चा का विषय बनता है “मेरी कुंडली में हार नहीं है।” यह बयान उनके काम करने के जुनून और मानसिक दृढ़ता को दिखाता है। त्रिपुरा में पहली बार सत्ता लाना और हरियाणा में सत्ता बरकरार रखने की व्यूहरचना और कठिन राज्यों में सांगठनिक सक्रियता, ये तमाम उदाहरण उनके इस दावे को मजबूत आधार देते हैं कि कुंडली में हार नहीं है। बिप्लब के लिए चुनाव कोई राजनीतिक रस्म नहीं, बल्कि संगठन, कार्यकर्ता, बूथ और रणनीति का एक सधा हुआ अभियान है। वे अनिश्चितता में यकीन नहीं रखते; उनका संदेश हमेशा साफ होता है- लड़ना है, संगठन को साधना है और विजय हासिल करनी है।
बेबाक छवि के पीछे गहरी सांगठनिक समझ
बिप्लब देब की पहचान भले ही एक मुखर और फायरब्रांड नेता की हो, लेकिन उनकी असली ताकत उनका सांगठनिक अनुशासन है। वे विरोधियों पर आक्रामक प्रहार करने के साथ-साथ पार्टी के आंतरिक ढांचे को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में उनकी भूमिका केवल मीडिया बयानों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय महामंत्री के दायित्व पर रहते हुए सांगठनिक नेटवर्क फैलाना, कैडर से निरंतर संवाद, स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल और केंद्रीय आलाकमान की सोच को धरातल पर लागू करना ही उनकी प्राथमिकता रहने वाला है। उनकी छवि फायरब्रांड युवा नेतृत्व की रही है, इसलिए माना जा रहा कि जेन जी में भी उनका अच्छा खासा असर भविष्य में देखने को मिलेगा। मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासनिक अनुभव और संगठन में लंबे समय तक काम करने की समझ के कारण वे सत्ता और संगठन, दोनों की जरूरतों को बखूबी समझते हैं।
भारतीय राजनीति के मौजूदा दौर में बिप्लब कुमार देब भाजपा के उस आक्रामक और रणनीतिक तेवर का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत एक साथ दिखाई देती है। अगर विपक्षी दलों के लिए उनकी बेबाकी एक बड़ी चुनौती है, तो पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए उनका आत्मविश्वास ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है।
त्रिपुरा की गलियों से शुरू होकर दिल्ली के राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा उनका सफर यह बताने के लिए काफी है कि वे उन नेताओं में से हैं जो चुनौतियों को स्वीकार करते हैं। बिप्लब देब केवल एक फायरब्रांड चेहरा भर नहीं हैं, वे चुनावी समर के वे मंजे हुए खिलाड़ी हैं जो मैदान में उतरते ही माहौल का रुख मोड़ने की क्षमता रखते हैं।