Edited By Krishan Rana, Updated: 28 Aug, 2026 03:30 PM

देशभर में रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट रिश्ते और प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया
कैथल (जयपाल रसूलपुर): देशभर में रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट रिश्ते और प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन कैथल जिले के सिरसल गांव में यह त्योहार सदियों से नहीं मनाया जाता। गांव में करीब 400 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे दो प्रमुख समुदायों—ब्राह्मणों के शांडिल्य गोत्र और रोड बिरादरी—से जुड़ी अलग-अलग ऐतिहासिक घटनाएं बताई जाती हैं।
गांव के बुजुर्गों के अनुसार शांडिल्य गोत्र के ब्राह्मण परिवारों में यह परंपरा औरंगजेब के शासनकाल से चली आ रही है। उस समय गांव के आसपास के इलाकों में मुस्लिम शासकों का शासन था। मान्यता के अनुसार शांडिल्य गोत्र के पूर्वजों के पास एक बेहद सुंदर घोड़ी थी, जिस पर शासक की नजर पड़ गई।
शासक ने घोड़ी देने की मांग की, लेकिन पूर्वजों ने उसे देने से इनकार कर दिया। इसके बाद शासक नाराज हो गया। रक्षाबंधन के दिन गांव के लोगों को भोज के बहाने बुलाया गया और वहां पुरुषों तथा महिलाओं का नरसंहार कर दिया गया। कुछ लोग अपनी जान बचाकर वहां से निकल गए और बाद में 84 क्षेत्र में आकर बस गए। गांव की मान्यता के अनुसार इसी घटना के बाद शांडिल्य गोत्र के परिवारों ने रक्षाबंधन मनाना छोड़ दिया।
गर्भवती महिला बची, बेटे का नाम रखा आसकरण
इस घटना से जुड़ी एक और मार्मिक कहानी भी गांव में सुनाई जाती है। बताया जाता है कि गांव की एक ब्राह्मण महिला उस समय गर्भवती थी। वह अपने मायके चली गई थी, इसलिए उसकी जान बच गई। बाद में उसके गर्भ से पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम आसकरण रखा गया।
बताया जाता है कि गांव के शांडिल्य गोत्र के सभी ब्राह्मण परिवार उसी आसकरण के वंशज हैं। पूर्वजों की हत्या की घटना की याद में यह परिवार आज भी रक्षाबंधन के दिन को शोक दिवस मानते हुए पर्व नहीं मनाता।
रोड बिरादरी की कहानी भी बादशाह से जुड़ी
रोड बिरादरी के संबंध में भी रक्षाबंधन न मनाने की एक अलग ऐतिहासिक कहानी बताई जाती है। बुजुर्ग कृष्ण कुमार के अनुसार उनके पूर्वज दिल्ली के पास बादली क्षेत्र में रहते थे। मान्यता है कि बादशाह ने वहां एक लड़की को डोला मांगा था, जिसका विरोध करने पर जंग छिड़ गई।
बताया जाता है कि रक्षाबंधन के दिन रोड बिरादरी के लोग परंपरागत रूप से अपने हथियारों की पूजा करते थे और हथियार नहीं उठाते थे। इसी अवसर का लाभ उठाकर शासक के सैनिकों ने उनके पूर्वजों की हत्या कर दी। कुछ लोग जान बचाकर वर्तमान करनाल, कैथल और कुरुक्षेत्र क्षेत्र में आकर बस गए।
इसके बाद रोड बिरादरी के लोगों ने भी रक्षाबंधन मनाना छोड़ दिया। हालांकि समय के साथ कुछ बदलाव आए हैं और गांव से बाहर रहने वाले तथा कुछ स्थानीय परिवार अब यह पर्व मनाने लगे हैं।
आज भी पूर्वजों की याद में नहीं मनाते पर्व
सिरसल में रक्षाबंधन न मनाने की यह परंपरा आज भी कई परिवारों में कायम है। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल त्योहार न मनाने की बात नहीं, बल्कि पूर्वजों की स्मृति और उनके साथ हुई घटनाओं को याद रखने की परंपरा है। वहीं समय के साथ कुछ परिवारों ने इस परंपरा से अलग होकर रक्षाबंधन मनाना शुरू कर दिया है। इसके बावजूद शांडिल्य गोत्र और रोड बिरादरी के अनेक परिवार आज भी इस दिन को अपने पूर्वजों की स्मृति से जोड़ते हुए रक्षाबंधन से दूरी बनाए रखते हैं।
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