22 साल बाद मिला इंसाफ... पुराने दहेज हत्या के मामले में पति बरी, 7 साल की सजा रद्द

Edited By Isha, Updated: 19 Aug, 2026 08:07 PM

husband acquitted in old dowry death case 7 year sentence quashed

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 22 वर्ष पुराने दहेज मृत्यु मामले में पति भानु प्रकाश को बड़ी राहत देते हुए उसे धारा 304-बी के आरोप से बरी कर दिया है। जस्टिस मंदीप पन्नू की अदालत ने ट्रायल कोर्ट

चंडीगढ़(चंन्द्र शेखर धरणी):   पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 22 वर्ष पुराने दहेज मृत्यु मामले में पति भानु प्रकाश को बड़ी राहत देते हुए उसे धारा 304-बी के आरोप से बरी कर दिया है। जस्टिस मंदीप पन्नू की अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि मृतका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर पति की ओर से प्रताड़ित या परेशान किया गया था।

90 प्रतिशत झुलसने के बाद हुई थी मौत
मामला वर्ष 1998 का है। गीतिका शर्मा की शादी 10 फरवरी 1993 को मुजफ्फरनगर में भानु प्रकाश से हुई थी। शादी के बाद वह पति के साथ यमुनानगर स्थित जगाधरी वर्कशाप कॉलोनी में रहने लगी। भानु प्रकाश जगाधरी रेलवे वर्कशाप में रेलवे कर्मचारी था।
चार अगस्त 1998 को दोपहर करीब 12 बजे गीतिका करीब 90 प्रतिशत झुलस गई। पति और पड़ोसियों ने उसे पहले रेलवे अस्पताल पहुंचाया। हालत गंभीर होने पर उसे पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया गया।

अस्पताल में दर्ज हुआ था मृतका का बयान
पीजीआई में उसी दिन रात करीब 8:45 बजे न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, यूटी चंडीगढ़ ने गीतिका का बयान दर्ज किया। कोर्ट ने इस बयान को मामले की महत्वपूर्ण कड़ी माना। गीतिका ने बताया था कि वह रसोई की दीवार पर पेंट कर रही थी। पेंट ब्रश को केरोसिन में भिगोते समय तेल उसके कपड़ों और फर्श पर गिर गया तथा केरोसिन की बोतल भी नीचे गिर गई। इसी दौरान गैस चूल्हा जल रहा था और उसके कपड़ों में आग लग गई।
गीतिका नौ अगस्त 1998 तक जीवित रही, लेकिन उसकी हालत गंभीर बनी रही। दोपहर करीब 1:15 बजे उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण 90 प्रतिशत संक्रमित जलने से उत्पन्न सेप्टीसीमिया बताया गया।

मौत के बाद पिता ने लगाए दहेज प्रताड़ना के आरोप
गीतिका की मौत के बाद उसी दिन करीब 2:30 बजे उसके पिता ने पुलिस को शिकायत दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पति भानु प्रकाश अपने बड़े भाई रूप किशोर शर्मा के कहने पर दहेज और पैसे की मांग को लेकर बेटी को परेशान करता था। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि पति ने केरोसिन डालकर गीतिका को जला दिया और परिवार के अन्य सदस्य भी कथित साजिश में शामिल थे।

संदिग्ध रही कथित सुसाइड नोट की बरामदगी
जांच के दौरान पुलिस को मृतका के नाम से पांच पुराने पत्र और तीन मई 1998 का एक नोट सौंपा गया। इस नोट में पति, जेठ और ससुर पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने के आरोप लगाए गए थे। पुलिस ने नोट को एफएसएल मधुबन भेजकर उसकी लिखावट की जांच कराई।

एक विशेषज्ञ रिपोर्ट में नोट और 24 फरवरी 1995 के पत्र की लिखावट एक ही व्यक्ति की बताई गई। बाद में अदालत के आदेश पर नोट की तुलना मृतका के अन्य स्वीकार किए गए पत्रों से भी कराई गई। हाई कोर्ट ने पाया कि इस संबंध में विशेषज्ञ राय एकमत नहीं थी। अदालत ने नोट की बरामदगी की परिस्थितियों को भी संदिग्ध माना।

जांच में अन्य आरोपितों को मिली थी क्लीन चिट
जांच के बाद पुलिस ने केवल भानु प्रकाश के खिलाफ धारा 304-बी के तहत चालान पेश किया। रूप किशोर शर्मा और राम सिंह को जांच में निर्दोष पाया गया और उनके खिलाफ मुकदमा आगे नहीं चला।
ट्रायल कोर्ट ने भानु प्रकाश को दहेज मृत्यु के मामले में दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि उसे धारा 302 के वैकल्पिक आरोप से बरी कर दिया गया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सजा बढ़ाने के लिए पुनरीक्षण याचिका दाखिल की, जबकि भानु प्रकाश ने अपनी दोषसिद्धि को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

पांच दिन तक जीवित रहने के बावजूद नहीं हुई शिकायत
हाई कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि गीतिका चार अगस्त को झुलसने के बाद नौ अगस्त तक जीवित रही। इस दौरान उसके माता-पिता पीजीआई में मौजूद थे, लेकिन उसकी मौत से पहले पुलिस को कोई शिकायत नहीं दी गई।

अदालत ने मृतका के अस्पताल में दर्ज शुरुआती बयान, उस समय परिजनों की मौजूदगी और बाद में लगाए गए आरोपों के बीच के अंतर को मामले के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।

संदेह का लाभ देते हुए दोषसिद्धि रद
हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को धारा 304-बी के तहत दोषसिद्धि के लिए आवश्यक तथ्यों को संदेह से परे साबित करना था, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्थापित नहीं हो सका कि गीतिका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर पति ने प्रताड़ित किया था।

इन परिस्थितियों में अदालत ने भानु प्रकाश को संदेह का लाभ देते हुए धारा 304-बी के आरोप से बरी कर दिया। उसकी अपील स्वीकार करते हुए यमुनानगर की ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि संबंधी फैसला और सात वर्ष की सजा रद कर दी गई।
 
 

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