Edited By Isha, Updated: 16 Aug, 2026 05:56 PM

मानसून के कमजोर रहने की आशंका अब बारिश के आंकड़ों में भी दिखाई देने लगी है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने कई महीने पहले ही इस साल मानसून के सामान्य से नीचे रहने का अनुमान जताया था।
चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी): मानसून के कमजोर रहने की आशंका अब बारिश के आंकड़ों में भी दिखाई देने लगी है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने कई महीने पहले ही इस साल मानसून के सामान्य से नीचे रहने का अनुमान जताया था। अब मानसून सीजन के दौरान देश में बारिश सामान्य से 12 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। उत्तर भारत में स्थिति और अधिक चिंताजनक है। 5 अगस्त तक हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली में सामान्य से 26 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि पंजाब में बारिश की कमी 33 प्रतिशत तक पहुंच गई।
कुरुक्षेत्र से भाजपा सांसद नवीन जिंदल द्वारा लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने देश के विभिन्न मौसम उपखंडों में मानसून की स्थिति से संबंधित आंकड़े साझा किए। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस बार मानसून का वितरण न केवल कमजोर रहा है, बल्कि कई क्षेत्रों में बारिश की कमी काफी अधिक है।
अप्रैल में ही आईएमडी ने दे दिया था कमजोर मानसून का संकेत
आईएमडी ने अप्रैल में मानसून को लेकर शुरुआती अनुमान जारी करते हुए पूरे सीजन में दीर्घ अवधि औसत यानी एलपीए की करीब 92 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान लगाया था। बाद में इस अनुमान को संशोधित कर 90 प्रतिशत कर दिया गया। मानसून के शुरुआती महीनों के आंकड़े अब मौसम विभाग के उस अनुमान को सही साबित करते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि मानसून का पूरा सीजन अभी समाप्त नहीं हुआ है और अगस्त तथा सितंबर में अच्छी बारिश होने पर मौजूदा कमी काफी हद तक दूर हो सकती है, लेकिन फिलहाल बारिश का असमान वितरण चिंता का कारण बना हुआ है।
जून में ही कमजोर शुरुआत ने बढ़ाई चिंता
इस साल मानसून की शुरुआत देश के लिए अच्छी नहीं रही। जून में देशभर में सामान्य से करीब 35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। महीने के दौरान लगभग 70 प्रतिशत जिले कम बारिश वाली श्रेणी में रहे। जून की कमजोर बारिश का असर खेती, जलाशयों और मिट्टी की नमी पर भी पड़ा। खास तौर पर वे इलाके प्रभावित हुए जहां खेती काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है।
जुलाई में स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ। मध्य भारत में अच्छी बारिश के कारण पूरे देश में जुलाई की बारिश सामान्य से एक प्रतिशत अधिक रही। इसके बावजूद जून की भारी कमी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी। जुलाई के अंत तक भी देश के 47 प्रतिशत जिले कम या बहुत कम बारिश वाली स्थिति में थे।
एल नीनो ने भी प्रभावित किया मानसून
इस साल कमजोर मानसून के पीछे एल नीनो को भी महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। आईएमडी ने अपने अप्रैल के पूर्वानुमान में एल नीनो को मानसून के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल किया था।
जून में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर क्षेत्र में कमजोर एल नीनो विकसित हुआ और बाद में इसकी तीव्रता मध्यम स्तर तक पहुंची। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, एल नीनो मानसूनी हवाओं और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। इस बार इसका असर बारिश की कुल मात्रा के साथ-साथ उसके वितरण पर भी दिखाई दिया। कई क्षेत्रों में बारिश के बीच लंबा अंतराल देखने को मिला। वहीं कुछ इलाकों में कम समय में तेज बारिश हुई। इससे कुल बारिश का आंकड़ा कुछ हद तक सुधरने के बावजूद जमीन पर पानी की उपलब्धता और खेती के लिए जरूरी मिट्टी की नमी की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर रही।
हरियाणा और पंजाब के आंकड़े बढ़ा रहे चिंता
उत्तर भारत में हरियाणा और पंजाब की स्थिति विशेष रूप से ध्यान खींच रही है। 5 अगस्त तक हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली में सामान्य से 26 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि पंजाब में कमी 33 प्रतिशत रही। हरियाणा के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की खरीफ फसलों में मानसून की बारिश और मिट्टी की नमी की अहम भूमिका रहती है। बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में किसानों को सिंचाई के अतिरिक्त साधनों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
पंजाब में भी 33 प्रतिशत बारिश की कमी कृषि क्षेत्र के लिए चुनौतीपूर्ण है। हालांकि प्रदेश में सिंचाई का मजबूत नेटवर्क है, लेकिन मानसून की बारिश खेती के साथ-साथ भूजल और जल संसाधनों पर दबाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कई राज्यों में 30 प्रतिशत से अधिक की कमी
देश के 16 मौसम उपखंड ऐसे रहे, जहां 5 अगस्त तक सामान्य से 20 प्रतिशत से अधिक कम बारिश दर्ज की गई। इनमें बिहार सबसे ऊपर रहा, जहां बारिश की कमी 38 प्रतिशत रही।
अरुणाचल प्रदेश में 36 प्रतिशत, असम-मेघालय और तटीय आंध्र प्रदेश-यनम में 35-35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। पंजाब और लक्षद्वीप में 33-33 प्रतिशत, जबकि रायलसीमा में 32 प्रतिशत की कमी रही। पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड में भी बारिश सामान्य से 30-30 प्रतिशत कम रही। पूर्वी राजस्थान में 22 प्रतिशत और देश के कई अन्य हिस्सों में भी बारिश का वितरण सामान्य नहीं रहा।
सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं, वितरण भी बड़ी चुनौती
इस मानसून की सबसे बड़ी चुनौती केवल बारिश की कुल कमी नहीं है। कई क्षेत्रों में बारिश कुछ दिनों में तेज हुई, जबकि उसके बाद लंबे समय तक सूखा अंतराल बना रहा। खेती के लिए बारिश का नियमित अंतराल महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और फसलों को पानी मिलता रहता है। असमान बारिश का असर जलाशयों, भूजल रिचार्ज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, कम समय में अत्यधिक बारिश होने पर जलभराव और फसलों को नुकसान जैसी समस्याएं भी पैदा होती हैं।
अगस्त-सितंबर की बारिश पर टिकी उम्मीदें
मानसून में अभी पर्याप्त समय बाकी है, इसलिए वर्तमान 12 प्रतिशत की कमी को अंतिम तस्वीर नहीं माना जा सकता। अगस्त और सितंबर में यदि अच्छी और व्यापक बारिश होती है तो देश के साथ-साथ हरियाणा और पंजाब में भी बारिश के घाटे को कम किया जा सकता है।
अब मौसम विभाग, कृषि क्षेत्र और सरकारों की निगाह मानसून के अगले चरण पर है। खासतौर पर हरियाणा और पंजाब में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले सप्ताह में बारिश किस तरह होती है और क्या वह अब तक की कमी को पूरा करने में मदद करती है।
फिलहाल आंकड़े यही संकेत दे रहे हैं कि इस साल मानसून ने शुरुआत से ही चुनौती पेश की है। जून की भारी कमी, जुलाई में असमान सुधार और अगस्त की शुरुआत तक बने बारिश के घाटे ने मौसम की तस्वीर को जटिल बना दिया है। ऐसे में आने वाले अगस्त-सितंबर की बारिश ही तय करेगी कि यह मानसून अंततः कितना कमजोर साबित होता है।