प्रख्यात वेदांत विद्वान स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती का ब्रह्मत्व में लय; स्वामी दयानंद आश्रम द्वारा वैश्विक स्मृति आयोजन की घोषणा

Edited By Gaurav Tiwari, Updated: 14 Jan, 2026 07:22 PM

swami dayanand ashram announces global memorial event

स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती की वेदांत दृष्टि में शास्त्र, युक्ति और अनुभव का समन्वय था। आदि शंकराचार्य के भाष्यों तथा स्वामी सच्चिदानंदेन्द्र सरस्वती के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने दर्शन को दैनिक जीवन में आत्मसात करने पर विशेष बल दिया।

गुड़गांव ब्यूरो : स्वामी दयानंद आश्रम, ऋषिकेश अत्यंत श्रद्धा के साथ यह सूचित करता है कि परम पूज्य वेदांताचार्य एवं स्वामी दयानंद सरस्वती जी के प्रत्यक्ष शिष्य स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती ने 10 जनवरी 2026 को अल्पकालिक अस्वस्थता के पश्चात ब्रह्मत्व—परम सत्य ब्रह्म में ऐक्य—को प्राप्त किया। उनकी अग्नि महासमाधि के पावन संस्कार 11 जनवरी 2026 को संपन्न हुए। आश्रम परिवार तथा विश्वभर के शिष्यगण उनके देहावसान पर शोक व्यक्त करते हुए उनके उस उज्ज्वल आध्यात्मिक विरासत का स्मरण कर रहे हैं, जो अद्वैत वेदांत, सरल जीवन और सतत आत्म-जिज्ञासा के प्रति उनके समर्पण से आलोकित है।

 

वेदांत को समर्पित जीवन:

10 अक्टूबर 1950 को आंध्र प्रदेश के एक छोटे से ग्राम में जन्मे स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती, आर्ष विद्या परंपरा के प्रारंभिक एवं प्रमुख आचार्यों में से एक थे। वे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ के रूप में विख्यात थे—संस्कृत, उपनिषदों तथा आदि शंकराचार्य की भाष्य परंपरा में उनकी अद्वितीय निपुणता के साथ-साथ गहन अनुभूति (अनुभव) उनकी शिक्षाओं की विशेषता थी। लगभग पाँच दशकों तक उन्होंने रमन केंद्र, लोधी रोड, नई दिल्ली में अध्यापन किया, जहाँ भारत एवं विदेशों से आए साधक उनकी स्पष्ट, गूढ़ और सहज व्याख्याओं से लाभान्वित हुए। भगवद्गीता, बृहदारण्यक उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, तथा माण्डूक्य उपनिषद पर उनके प्रवचन विद्वत् जगत में विशेष रूप से सराहे गए, क्योंकि वे शास्त्रीय कठोरता और सार्वभौमिक बोध के बीच सेतु स्थापित करते थे। उनकी शिक्षाओं का मूल मंत्र था—“वेदांत विकल्परहित है”—अर्थात् आत्म-जिज्ञासा (जिज्ञासा) के पथ पर पूर्ण समर्पण। उनका प्रेरक वाक्य, “जब तक जिज्ञासा है, तब तक शिक्षण चलता रहेगा,” आज भी साधकों के लिए पथप्रदर्शक है।

 

स्मृति एवं श्रद्धांजलि आयोजन:

स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती के जीवन एवं योगदान के सम्मान में स्वामी दयानंद आश्रम द्वारा 25 जनवरी 2026, प्रातः 8:00 बजे, ऋषिकेश स्थित आश्रम परिसर में विष्णु सहस्रनाम पाठ का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर उनके सह-संन्यासी एवं प्रख्यात विद्वान स्वामी साक्षात्कृतानंद सरस्वती द्वारा स्वामीजी के जीवन और शिक्षाओं पर प्रेरक वक्तव्य दिया जाएगा। कार्यक्रम में षोडशी भंडारा (16 साधुओं के लिए पवित्र भोजन) तथा महा भंडारा (200 साधुओं एवं 100 आश्रमवासियों हेतु) का आयोजन भी होगा, जो संन्यास परंपरा की सेवा भावना को प्रतिपादित करता है। आश्रम के एक प्रवक्ता ने कहा यह आयोजन केवल एक महान आत्मा के देहावसान का शोक नहीं, बल्कि वेदांत को दिए गए उनके शाश्वत योगदान का उत्सव है। स्वामीजी का विश्वास था कि जब तक आध्यात्मिक जिज्ञासा जीवित है, गुरु की वाणी भी जीवित रहती है।”

 

शाश्वत विरासत और वैश्विक प्रभाव:

स्वामी प्रबुद्धानंद सरस्वती की वेदांत दृष्टि में शास्त्र, युक्ति और अनुभव का समन्वय था। आदि शंकराचार्य के भाष्यों तथा स्वामी सच्चिदानंदेन्द्र सरस्वती के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने दर्शन को दैनिक जीवन में आत्मसात करने पर विशेष बल दिया। कठोपनिषद, तैत्तिरीय उपनिषद तथा अन्य वैदिक ग्रंथों पर उनके प्रवचन और कक्षाएँ आज भी परंपरा की अमूल्य धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं। देश-विदेश के विद्वानों और साधकों द्वारा उन्हें “आधुनिक भारत के सच्चे शंकराचार्य” के रूप में सम्मानित किया जाता है। आश्रम विश्वभर के भक्तों से आग्रह करता है कि वे 25 जनवरी 2026 के आयोजन में प्रत्यक्ष अथवा डिजिटल माध्यमों से सहभागिता करें। जो उपस्थित नहीं हो सकेंगे, उनके लिए विष्णु सहस्रनाम पाठ एवं प्रवचन का सीधा प्रसारण उपलब्ध कराया जाएगा। ऋषिकेश जब इस महान वेदांताचार्य को आध्यात्मिक विदाई दे रहा है, तब संपूर्ण विश्व उस गुरु को स्मरण कर रहा है जिनका जीवन आत्मा और ब्रह्म के सत्य का सजीव उदाहरण था—निराकार, शाश्वत और अनंत। जब तक जिज्ञासा है, उनकी शिक्षा चलती रहेगी।

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