निजी स्कूलों को नॉट फॉर प्रॉफिट के बंधन से मुक्ति मिलनी चाहिए : मोदी

Edited By Isha, Updated: 23 Dec, 2019 11:07 AM

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वर्तमान में जो शिक्षा नीति है इसमें बहुत ही खामियां हैं। आज 85 प्रतिशत ग्रैजुएशन और इंजीनियर्स जॉब के लायक नहीं हैं। यह बात निसा के राजस्थान प्रभारी डा. दिलीप मोदी ने कही। इनका कहना है कि ऐसी शिक्षा......

रतिया (ललित) : वर्तमान में जो शिक्षा नीति है इसमें बहुत ही खामियां हैं। आज 85 प्रतिशत ग्रैजुएशन और इंजीनियर्स जॉब के लायक नहीं हैं। यह बात निसा के राजस्थान प्रभारी डा. दिलीप मोदी ने कही। इनका कहना है कि ऐसी शिक्षा से युवा न तो रोजगार के लिए तैयार हुआ है और कागजी प्रमाण पत्र हाथ में लेकर न ही खेती बाड़ी या मजदूरी की ओर जाएगा। फिर ऐसी शिक्षा किस काम की है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली बहुत ही खामियों से पूर्ण हैं। निजी स्कूलों पर सरकार का बहुत अधिक हस्तक्षेप चिंता का विषय है। उन्होंने का कि आजादी के बाद से ही सरकारी एकाधिकार ने ही शिक्षा का बंटाधार किया हुआ है। 

बी.एस.एन.एल. के समय टैलीफोन सेवा और शुल्क याद करे और अब मुक्त मोबाइल सेवा और शुल्क क्वालिटी की तुलना करें इसी तरह राष्ट्रीय बैंकों के एकाधिकार के समय को याद करे और अब निजी बैंकों की सेवा ओर तकनीकी सुविधाओ में अंतर महसूस करें तो अंतर स्पष्ट नजर आते हैं जिस किसी भी सेवा क्षेत्र में सरकारी उपक्रमों का एकाधिकार या अनावश्यक नियंत्रण है वह क्षेत्र आज भी बर्बाद है। 

ऐसे अनेक उदाहरण हो सकते हैं। शिक्षा का भी यही हाल है। कैसी भी शिक्षा नीति बना लो अगर शिक्षा में स्वायतत्ता नहीं दी गई तो आजादी के 73 वर्ष बाद भी जो नहीं कर पाए, अब आगे भी नहीं कर पाएंगे। सरकारी स्कूलों में प्रति विद्यार्थी आज भी 5-6 हजार रुपए प्रति महीना खर्च होता है। इसके अतिरिक्त सैंकड़ों योजनाएं, अनेक सुविधाएं, फ्री स्कीम, भूमि, फर्नीचर अनेक सुविधाओं पर करोड़ों खर्च वह अलग और आऊटपुट क्या आ रही है यह सरकारों के स्वयं के आंकड़े व प्रतिवर्ष परिणाम ही बताते हैं।

मोदी ने सरकार से मांग की है कि सरकार द्वारा बच्चे पर खर्च 5-6 हजार रुपए लगभग के आधा 3 हजार रुपए तक प्रतिमाह का वाउचर सीधा विद्यार्थी को देना चाहिए ताकि उसे अपने पसंद का स्कूल चुनने की आजादी हो। इस उपाय से वर्तमान खर्च के आधे से भी कम खर्च पर गुणात्मक शिक्षा मिलने की गारंटी है। डा. दिलीप मोदी का कहना है कि अगर क्वालिटी शिक्षा चाहिए तो इसे मुक्त करना होगा वरना जैसे चल रहा है वैसे आगे ही चलता रहेगा चाहे जितनी ही नीतियां क्यों न बना लें। वर्तमान में निजी स्कूलों में सरकार का इतना अधिक हस्तक्षेप हो गया है कि न कोई अपनी मर्जी से शिक्षा दे रहा है और न ही कोई ले रहा है। अब तक शिक्षा पर न जाने सरकारों ने कितने ही प्रयोग कर डालें कि निजी स्कूलों में अधिक हस्तक्षेप करने से शिक्षा बाधित होती है। 

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