राम रहीम की 21 दिन की आजादी पर बवाल, पीड़ित परिवार ने दागे चुभते सवाल, 'कानून सबके लिए बराबर क्यों नहीं?'

Edited By Isha, Updated: 25 Aug, 2026 12:53 PM

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सिरसा के डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 21 दिन की फरलो मिलने के बाद एक बार फिर से उनकी रिहाई को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। विभिन्न आपराधिक मामलों में रोहतक की सुनारिया

सिरसा(सतनाम): सिरसा के डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 21 दिन की फरलो मिलने के बाद एक बार फिर से उनकी रिहाई को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। विभिन्न आपराधिक मामलों में रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहे राम रहीम को फरलो दिए जाने पर पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने प्रदेश सरकार और कानून की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। अंशुल छत्रपति ने आरोप लगाया कि आखिर प्रदेश सरकार राम रहीम पर किस वजह से बार-बार मेहरबान हो रही है और उसे लगातार पैरोल व फरलो का लाभ क्यों मिल रहा है।

 सिरसा में मीडिया से बातचीत करते हुए अंशुल छत्रपति ने कहा कि राम रहीम एक सजायाफ्ता और आदतन अपराधी है। उसके खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं और कुछ मामले अभी भी अदालतों में विचाराधीन हैं। ऐसे में उसे बार-बार जेल से बाहर आने की अनुमति दिए जाने पर आपत्ति जाहिर की जा रही है। अंशुल छत्रपति ने कहा कि प्रदेश सरकार और प्रशासन को इस पूरे मामले में पारदर्शिता बरतनी चाहिए और बताया जाना चाहिए कि किन आधारों पर राम रहीम को बार-बार पैरोल और फरलो दी जा रही है।

 अंशुल छत्रपति ने कहा कि राम रहीम इस समय रोहतक की सुनारिया जेल में सजा काट रहा है। साध्वियों से दुष्कर्म के मामलों में उसे अदालत द्वारा दोषी ठहराया जा चुका है और वह सजा भुगत रहा है। इसके अलावा पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड सहित अन्य मामलों में भी उसे सजा सुनाई जा चुकी है। उन्होंने कहा कि इतने गंभीर मामलों में दोषी व्यक्ति को लगातार जेल से बाहर आने का अवसर मिलना कानून की प्रक्रिया और उसके समान रूप से लागू होने पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि आम कैदियों और प्रभावशाली लोगों के मामलों में कानून का व्यवहार एक जैसा दिखाई देना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति गंभीर अपराधों में सजा काट रहा है तो उसकी पैरोल और फरलो के मामलों में सभी कानूनी प्रावधानों और शर्तों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। अंशुल छत्रपति ने कहा कि राम रहीम के मामले में बार-बार रिहाई मिलने से पीड़ित पक्ष और आम जनता के बीच कई तरह के सवाल पैदा होते हैं।

 अंशुल छत्रपति ने राम रहीम को आदतन अपराधी बताते हुए कहा कि उसके खिलाफ सिर्फ एक मामला नहीं बल्कि कई गंभीर आपराधिक मामले रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में भी राम रहीम से जुड़े मामलों की सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में उसकी फरलो को लेकर संबंधित विभागों और सरकार को पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। उन्होंने साधुओं को नपुंसक बनाए जाने से जुड़े मामले का भी जिक्र किया। अंशुल छत्रपति के अनुसार यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और इसकी कानूनी प्रक्रिया पूरी होना बाकी है। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर मामलों में अदालती सुनवाई चल रही हो और वह अन्य मामलों में पहले से सजा काट रहा हो तब उसे मिलने वाली रियायतों को लेकर विशेष सतर्कता जरूरी है।

  अंशुल छत्रपति ने आरोप लगाया कि राम रहीम को बार-बार जेल से बाहर भेजने के पीछे उसे स्थायी रूप से बाहर रखने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक राजनीतिक या प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि कानून और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है। उनके अनुसार यदि किसी सजायाफ्ता व्यक्ति को लगातार पैरोल और फरलो मिलती रहे तो इससे पीड़ितों के परिवारों में भी निराशा और असंतोष पैदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में न्याय पाने के लिए उनके परिवार को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। कई वर्षों तक चली इस कानूनी प्रक्रिया के बाद दोषियों को सजा मिली है । ऐसे में जब दोषी व्यक्ति बार-बार जेल से बाहर आता है तो पीड़ित परिवार के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। अंशुल छत्रपति ने कहा कि न्याय केवल सजा सुनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरी न्यायिक और कानूनी प्रक्रिया में पीड़ित पक्ष के अधिकारों और भावनाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
 

  फिलहाल अंशुल छत्रपति का कहना है कि राम रहीम के मामले में कानून की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। उन्होंने अदालत से भी इस मामले को लेकर संज्ञान लेने की मांग की है। साथ ही उन्होंने कहा कि गंभीर अपराधों में सजा काट रहे किसी भी व्यक्ति को मिलने वाली पैरोल और फरलो के मामले में नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए। अंशुल छत्रपति ने दोहराया कि उनका भरोसा न्यायपालिका पर है और वह चाहते हैं कि कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो। उनका कहना है कि राम रहीम को बार-बार मिलने वाली रिहाई की अनुमति पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। क्योंकि मामला केवल 21 दिन की फरलो का नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कानून, न्याय, पीड़ितों के अधिकार और व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है।

 

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