Edited By Isha, Updated: 08 Jan, 2026 05:12 PM
हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने जिला भिवानी के थाना सदर में सिविल प्रकृति के विवाद के दौरान बी.एन.एस.एस. की धारा 126/170 का अनुचित प्रयोग कर एक व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने के मामले
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी ): हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने जिला भिवानी के थाना सदर में सिविल प्रकृति के विवाद के दौरान बी.एन.एस.एस. की धारा 126/170 का अनुचित प्रयोग कर एक व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने इसे मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए संबंधित पुलिस अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं।
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा के समक्ष प्रस्तुत पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, दो भाइयों के बीच सिविल विवाद से संबंधित शिकायत की जांच के दौरान सहायक उप निरीक्षक/ई.एस.आई. वीरेंद्र द्वारा निवारक धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की गई। हालांकि, आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बी.एन.एस.एस. की धारा 126 एवं 170 (पूर्व में दं.प्र.सं. की धारा 107/151) का उद्देश्य निवारक न्याय है, न कि दंडात्मक, और इन धाराओं को लागू करने के लिए आवश्यक शर्तें इस मामले में पूरी नहीं होतीं।
जस्टिस ललित बत्रा ने कहा कि जब मामला सिविल प्रकृति का था और दोनों पक्ष पुलिस स्टेशन में पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में मौजूद थे, तब शांति भंग या किसी संज्ञेय अपराध की आशंका नहीं थी।रिपोर्ट के सावधानीपूर्वक परीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि बी.एन.एस.एस. की धारा 126/170 (पूर्व में दं.प्र.सं. की धारा 107/151) को लागू करने हेतु निर्धारित शर्तें पूर्ण नहीं होतीं। बी.एन.एस.एस. की धारा 126 एवं 170 का उद्देश्य निवारक न्याय है, न कि दंडात्मक। धारा 170 का प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब शांति भंग होने का तात्कालिक खतरा या धारा 126 के अंतर्गत शांति भंग की संभावना हो। धारा 170 के अंतर्गत गिरफ्तारी तभी उचित ठहराई जा सकती है जब संबंधित व्यक्ति किसी संज्ञेय अपराध को करने की योजना बनाता हो।
तथापि, वर्तमान मामले में पुलिस अधीक्षक, भिवानी ने अपनी दिनांक 02.12.2025 की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि जगजीत द्वारा दायर शिकायत की जांच में मामला सिविल प्रकृति का पाया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि सहायक उप निरीक्षक/ई.एस.आई. वीरेंद्र ने जांच कार्यवाही को शांति भंग की आशंका तथा संबंधित व्यक्ति (शिकायतकर्ता-अशोक कुमार) द्वारा किसी संज्ञेय अपराध को करने की मंशा में परिवर्तित कर दिया, जबकि कहीं भी यह मत व्यक्त नहीं किया गया कि अपराध को अन्यथा रोका नहीं जा सकता था, और इस प्रकार बी.एन.एस.एस. की धारा 126/170 का प्रयोग कर दिया गया। किसी ठोस सामग्री के बिना एकतरफा एवं चयनात्मक रूप से इन प्रावधानों का प्रयोग सहायक उप निरीक्षक/ई.एस.आई. वीरेंद्र के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण और शक्ति के दुरुपयोग को दर्शाता है।
इस संदर्भ में हरियाणा मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा“ ने अपने आदेश में लिखा है कि राजेंद्र सिंह पठानिया एवं अन्य बनाम राज्य (एन.सी.टी. दिल्ली एवं अन्य)”, 2011 (13) एस.सी.सी. 329 के निर्णय पर भी भरोसा किया जा सकता है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दं.प्र.सं. की धारा 107 एवं 151 की व्याख्या करते हुए निम्नलिखित अवलोकन किया है:
“14. दं.प्र.सं. की धारा 107/151 का उद्देश्य निवारक न्याय है, न कि दंडात्मक। धारा 151 का प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब शांति भंग होने का तात्कालिक खतरा या धारा 107 के अंतर्गत शांति भंग की संभावना हो। धारा 151 के अंतर्गत गिरफ्तारी तभी समर्थित हो सकती है जब गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति किसी संज्ञेय अपराध को करने की योजना बनाता हो। यदि धारा 107/151 के अंतर्गत कार्यवाही शांति भंग की आशंका से निपटने हेतु अत्यंत आवश्यक प्रतीत होती है, तो संबंधित प्राधिकारी के लिए त्वरित कार्रवाई करना आवश्यक है। धारा 107 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को प्रदत्त अधिकार आपात स्थिति में ही प्रयोग किए जाने चाहिए।
दं.प्र.सं. की धारा 151 के साधारण अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि किन परिस्थितियों में कोई पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश अथवा वारंट के बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। वह ऐसा तभी कर सकता है जब उसे यह जानकारी हो कि संबंधित व्यक्ति किसी संज्ञेय अपराध को करने की योजना बना रहा है। इसके अतिरिक्त एक और आवश्यक शर्त यह है कि गिरफ्तारी तभी की जाए जब पुलिस अधिकारी को यह प्रतीत हो कि अपराध को अन्यथा रोका नहीं जा सकता। अतः यह धारा बिना मजिस्ट्रेट के आदेश अथवा वारंट के गिरफ्तारी की शक्ति के प्रयोग हेतु आवश्यक शर्तों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करती है। यदि ये शर्तें पूरी नहीं होतीं और किसी व्यक्ति को धारा 151 के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है, तो गिरफ्तारी करने वाला प्राधिकारी संविधान के अनुच्छेद 21 एवं 22 में निहित मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए विधिक कार्यवाही के दायरे में आ सकता है।”
उपर्युक्त स्थापित विधिक सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी स्थिति में बी.एन.एस.एस. की धारा 170 (दं.प्र.सं. की धारा 151) के अंतर्गत अपेक्षित शर्तें पूरी नहीं होतीं और किसी व्यक्ति (वर्तमान शिकायतकर्ता) को धारा 170 के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है, तो गिरफ्तारी करने वाला प्राधिकारी संविधान के अनुच्छेद 21 एवं 22 के अंतर्गत निहित मौलिक मानव अधिकारों के उल्लंघन हेतु विधिक कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा।
आयोग के असिस्टेंट रजिस्ट्रार डॉ. पुनीत अरोड़ा ने बताया कि उपलब्ध तथ्यों एवं गंभीर आरोपों को दृष्टिगत रखते हुए, सहायक उप निरीक्षक/ई.एस.आई. वीरेंद्र, थाना सदर, भिवानी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है तथा जिला पुलिस प्रमुख होने के नाते पुलिस अधीक्षक, भिवानी से भी स्पष्टीकरण माँगा गया हैं कि शिकायतकर्ता को मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजा क्यों न दिया जाए? संबंधित अधिकारी को अपना स्पष्टीकरण आयोग के जाँच निदेशक के माध्यम से अगली सुनवाई की तिथि 25 फरवरी 2026 से एक सप्ताह पूर्व आयोग के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।