Edited By Isha, Updated: 23 Jan, 2026 01:07 PM

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज को मिलने वाली पेंशन एक सांविधानिक रूप से संरक्षित, निहित अधिकार है जिसे समायोजित या न्यूट्रलाइज नहीं किया जा सकता।
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज को मिलने वाली पेंशन एक सांविधानिक रूप से संरक्षित, निहित अधिकार है जिसे समायोजित या न्यूट्रलाइज नहीं किया जा सकता। अदालत ने हरियाणा सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें लोकायुक्त के रूप में नियुक्त पूर्व जजों के वेतन से उनकी पेशन काटी जा रही थी।
न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने कहा कि हरियाणा लोकायुक्त अधिनियम, 2002 के तहत लोकायुक्त का वेतन वर्तमान हाईकोर्ट जज के समकक्ष तय है और इसमें पेंशन कटौती का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में राज्य सरकार को अपने स्तर पर पेंशन काटने का कोई अधिकार नहीं था। अदालत ने इस कार्रवाई को असाविधानिक, भेदभावपूर्ण और विधिसम्मत आधार से रहित करार देते हुए सभी बकाया राशि 6 प्रतिशत व्याज सहित चार सप्ताह में जारी करने का निर्देश दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति एनके सूद सहित अन्य पूर्व जजों की याचिका पर आया, जिन्होंने हरियाणा के लोकायुक्त के रूप में निर्धारितb पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया था। याचिकाकर्ताओं ने 18 अगस्त 2022 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए राज्य ने उन्हें हाईकोर्ट जज के समकक्ष पूरा वेतन देने से इन्कार करते हुए पेंशन काट ली थी।
मामले की मूल कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति मौदगिल ने कहा, यह विवाद न तो न्यायसंगत का है और न ही प्रशासनिक विवेक का। यह सांविधानिक आदेश का प्रश्न है। जहां संविधान और संसदीय कानून प्रभावी ही वहां कार्यपालिका की व्याख्या टिक नहीं सकती। अदालत ने राज्य के दोहरे लाभ वाले तर्क को खारिज कर दिया।