धान-गेहूं नहीं... ड्रैगन फ्रूट से लाखों की कमाई, सिरसा का किसान बना मिसाल; पढ़िए कहानी

Edited By Harman, Updated: 12 Jun, 2026 12:27 PM

not paddy or wheat  earning lakhs from dragon fruit

परंपरागत खेती से हटकर हरियाणा के किसानों ने अनुबंध खेती और ओपन मंडी का लाभ लेते हुए न केवल खेती में नए प्रयोग किए हैं, बल्कि मुनाफा भी अधिक कमाया है। इसी तरह के प्रयोगधर्मी किसान हैं सिरसा जिला के गांव रसूलपुर के किसान केसर चंद। सिंचाई विभाग से सब...

सिरसा (सतनाम सिंह) : परंपरागत खेती से हटकर हरियाणा के किसानों ने अनुबंध खेती और ओपन मंडी का लाभ लेते हुए न केवल खेती में नए प्रयोग किए हैं, बल्कि मुनाफा भी अधिक कमाया है। इसी तरह के प्रयोगधर्मी किसान हैं सिरसा जिला के गांव रसूलपुर के किसान केसर चंद। सिंचाई विभाग से सब डिविज़नल क्लर्क रिटायर हुए केसर चंद ड्रैगन फ्रूट की खेती की है। इसके अलावा केसर चंद ने ऑर्गेनिक खेती को भी तवज्जो सब्जियों की भी खेती की है। प्याज, लहसून, आलू व सब्जियों की काश्त के जरिए आज धान, कॉटन, गेहूं की फसलों के मुकाबले कई गुणा मुनाफा कमा रहे हैं। खास बात यह है कि कई सालों से उनके परिवार के सदस्यों ने एक एकड़ में बेबी कॉन फसल बोई और 12 क्विंटल फसल का उत्पादन हुआ। इसके साथ ही अब केसर चंद अब ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे है। करीब डेढ़ एकड़ में ड्रैगन फ्रूट की खेती कर लाखों रुपए कमा रहे है। 

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केसर चंद के मुताबिक इस बार 30 क्विंटल की पैदावार हुई है और इस फ़सल से तकरीबन 6 लाख रुपए का मुनाफा हुआ है। केसर चंद के साथ उसकी पत्नी बागा रानी , बेटा हरनेक सिंह और बहु दर्शना रानी भी दिन रात जुटे हुए है। ड्रैगन फ्रूट की खेती भी तकरीबन 4 महीने की खेती है और जल्दी तैयार भी हो जाती है। इसका फायदा खास तौर पर यह है कि ड्रैगन फ्रूट की डिमांड बड़े शहरों में ज्यादा होती है इसलिए बड़े विक्रेता खेत से ही फ्रूट को खरीदकर बड़े शहरों में बेचते है। केसर चंद के मुताबिक हरियाणा , पंजाब , राजस्थान सहित कई प्रदेशों में ड्रैगन फ्रूट की सप्लाई होती है। वे पूरी तरह से जैविक खेती करते हैं। पूरा परिवार तो खेतीबाड़ी करता ही है, उनकी ओर से की जा रही बहुद्देश्यीय खेती के कारण सैकड़ों लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है। केसर चंद ने दावा किया है कि ड्रैगन फ्रूट खाने से शरीर में कई तरह की बीमारियों से निजात मिलता है। खासकर शरीर में खून बढ़ाने की क्षमता मिलती है। उन्होंने कहा कि इस फसल से पानी की काफ़ी बचत होती है और दूसरे किसान जो बरसों से परम्परागत खेती को ही त्वज्जो दे रहे है दूसरी फसलों के साथ साथ ड्रैगन फ्रूट की खेती भी जरूर करनी चाहिए।

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दरअसल हरियाणा में गेहूं, धान, नरमा, सरसों, बाजरा फसलों के मोहपाश में किसान बंधे हुए हैं। हालांकि हरियाणा के उद्यान विभाग की ओर से किन्नू, अमरूद, अंगूर के अलावा फूलों, मशरूम, मसालों व सब्जियों की खेती के लिए 20 से 30 फीसदी अनुदान दिया जाता है। विभाग की ओर से कोल्ड स्टोरेज के अलावा सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली पर भी अनुदान दिया जाता है। बावजूद किसान जैविक खेती नहीं अपना रहे हैं। इन सबके बीच कुछ किसान आज फसल विविधीकरण अपनाकर ओपन मार्केट में अपनी फसल बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं। रसूलपुर के किसान केसर चंद ने अपने परिवारिक सदस्यों के साथ मिलकर पहले सब्जियों की काश्त की। लहसून, प्याज की खेती में मुनाफा हुआ तो इस साल ड्रेगन फ्रुट की शुरूआत की। इस समय उन्होंने 6 एकड़ में लहसून, 3 एकड़ में प्याज, 4 कनाल में आलू, 1 एकड़ में बेबी कॉन, डेढ़ एकड़ ड्रैगन फ्रूट बोआ है। अमरुद का बाग भी लगाया है। इसके अलावा कई तरह की सब्जियों की काश्त की है।

 केसर चंद ने बताया कि इस बार उन्होंने प्रयोग के तौर पर डेढ़ एकड़ में ड्रैगन फ्रूट भी लगाया है। यह बेहद महँगा फ्रूट है। एक किलोग्राम की कीमत 250 रुपए है। उनके अनुसार तीसरे साल तक एक एकड़ में 50 क्विंटल का उत्पादन हो जाता है यानी करीब 10 लाख रुपए का। यह ड्रैगन फ्रूट प्लेट लेट्स एवं ब्लड बढ़ाने में सहायक होता है। फसलीकरण में प्रयोग का नतीजा है कि आज किसान केसर चंद की दो बड़ी कोठियां, दो ट्रैक्टर सहित, जीपें, कार, दोपहिया वाहन, कम्बाइन व अन्य कृषि यंत्र उसकी समृद्धि की गवाही देती हैं। दूसरे किसान भी इस तरह के प्रयोग कर और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर खेती को नई सोच के साथ घाटे की बजाय मुनाफ़े की पटरी पर ला सकते हैं। केसर चंद न सिर्फ प्रगतिशील किसान है बल्कि दूसरे किसानों को भी ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए प्रेरित करेंगे। उन्होंने कहा कि ड्रैगन फ्रूट की फ़सल का स्टोर 6 महीने से लेकर एक साल तक किया जा सकता है और उस दौरान यह फ़सल ख़राब भी नहीं होती है।

हरियाणा में करीब 36 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। रबी सीजन में यहां पर करीब साढ़े 25 लाख हैक्टेयर में गेहूं, साढ़े 6 लाख हैक्टेयर में सरसों के अलावा कुछ रकबे पर चने व जौं की खेती की जाती है। खरीफ सीजन में करीब साढ़े 12 लाख हैक्टेयर में धान, 7 लाख हैक्टेयर में कॉटन, साढ़े 5 लाख हैक्टेयर में बाजारा व 70 हजार हैक्टेयर में ज्वार की खेती की जाती है। करीब 64 हजार हैक्टेयर में बागवानी व 4 लाख हैक्टेयर में सब्जियों की काश्त की जाती है। केसर चंद की बहु दर्शना रानी ने बताया कि पिछले कई सालों से ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे है। इससे मुनाफा दूसरी फसलों के मुकाबले में ज्यादा होता है। उन्होंने कहा कि दूसरी फसलों के मुकाबले में इस फसल में नुकसान की संभावना कम ही होती है। जैसे कई बार मौसम ख़राब होने की वजह से गेहूं सरसों धान कपास की फसल ख़राब हो जाती है। वैसे उस मौसम में इस फसल के ख़राब होने की स्थिति कम ही रहती है।

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