हरियाणा सरकार को बड़ा झटका: CAG रिपोर्ट में 'ई-गवर्नेंस' की खुली पोल, अब भी मैनुअल हो रहा है अहम काम

Edited By Isha, Updated: 02 Sep, 2026 01:22 PM

cag report exposes the flaws in e governance

हरियाणा सरकार की सूचना प्रणालियों की कार्यप्रणाली को लेकर भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। 2026 की प्रतिवेदन संख्या 3 में ई-प्रोक्योरमेंट परियो

चंडीगढ़(चंद्र शेखर धरणी): हरियाणा सरकार की सूचना प्रणालियों की कार्यप्रणाली को लेकर भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। 2026 की प्रतिवेदन संख्या 3 में ई-प्रोक्योरमेंट परियोजना तथा आबकारी विभाग की लाइसेंस प्रबंधन, शराब उत्पादन और वितरण प्रणाली की सूचना प्रणाली का परीक्षण किया गया। रिपोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 151 के तहत विधानसभा के पटल पर रखने के लिए राज्यपाल को प्रस्तुत करने हेतु तैयार किया गया था और इसे 12 अगस्त 2026 को राज्य सरकार को भेजा गया।

कैग ने दोनों डिजिटल व्यवस्थाओं में तकनीकी क्षमता के साथ-साथ प्रक्रियागत नियंत्रण, निगरानी, डेटा प्रबंधन, वित्तीय सत्यापन, प्रशिक्षण और साइबर सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की जांच की। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि कई प्रक्रियाओं को पूरी तरह डिजिटल बनाने के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण गतिविधियां अभी भी मैनुअल या ऑफलाइन तरीके से संचालित होती रहीं।

ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली का उद्देश्य सरकारी खरीद में प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना था। लेखापरीक्षा में पाया गया कि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के साथ अपेक्षित करार का निष्पादन नहीं हुआ, जबकि परियोजना निगरानी इकाई (पीएमयू) भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकी।
कुछ महत्वपूर्ण मॉड्यूल और कार्यक्षमताएं उपलब्ध नहीं थीं। वहीं, कई गतिविधियां या तो नहीं की गईं अथवा पोर्टल से बाहर ऑफलाइन तरीके से पूरी की गईं। उपयोगकर्ताओं को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलने से भी प्रणाली के प्रभावी इस्तेमाल पर असर पड़ा।

निविदा प्रक्रिया में कई स्तरों पर कमियां
कैग के अनुसार निविदा प्रक्रिया में भी अनेक प्रक्रियागत कमजोरियां सामने आईं। निविदाओं का पर्याप्त प्रचार नहीं हुआ, बोली लगाने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया और जहां आवश्यक था, वहां निविदा-सह-नीलामी की कार्यक्षमता का इस्तेमाल नहीं किया गया।

पुनः आमंत्रित निविदाओं और मूल निविदाओं के बीच लिंक का अभाव तथा निविदा प्रक्रिया के लिए डुप्लीकेट यूजर तैयार किए जाने जैसे मामले भी सामने आए।
सिस्टम में समय विस्तार, बोली खुली रखने की अवधि, शिकायत निवारण की समय सीमा और शुद्धिपत्र जारी करने जैसे महत्वपूर्ण कारोबारी नियमों को पूरी तरह मैप नहीं किया गया था।

बोली प्रक्रिया में नियंत्रण कमजोर
लेखापरीक्षा में ऐसे उदाहरण भी सामने आए, जिनमें मिलीभगतपूर्ण बोली या बोली में हेरफेर की संभावना के संकेत मिले। एक ही आईपी एड्रेस अथवा खरीद संस्था के कंप्यूटरों से बहुत कम अंतराल में अनेक बोलियां जमा किए जाने के मामले पाए गए।
कैग ने ऐसे मामलों को निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना है। साथ ही, कम अवधि के लिए निविदा विस्तार, अलग-अलग तारीखों पर बोलियों को डिक्रिप्ट करना और बोलियों को निर्धारित क्रम से अलग खोलने जैसी स्थितियां भी सामने आईं।

डेटा प्रबंधन में भी असंगतियां
पोर्टल पर जानकारी अपडेट नहीं होने से निगरानी प्रभावित कैग ने ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली में डेटा की विश्वसनीयता और प्रबंधन सूचना प्रणाली से संबंधित कमियों को भी रेखांकित किया। कई मामलों में निविदा चरण अपडेट नहीं हुए, मूल्यांकन सारांश अपलोड नहीं किए गए और यूजर डेटा तथा प्रोफाइल प्रबंधन में विसंगतियां मिलीं।
पोर्टल पर आवंटन मूल्य और निविदा स्थिति से संबंधित सूचनाओं में भी अंतर पाया गया। इससे अधिकारियों के लिए पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रभावी निगरानी करना चुनौतीपूर्ण हुआ।

फीस और बयाना राशि के प्रबंधन में वित्तीय जोखिम
फीस और बयाना राशि के मामले में भी वित्तीय नियमों के अनुपालन से संबंधित कमियां सामने आईं। कुछ रकम सही तरीके से ट्रांसफर या समायोजित नहीं हुई, कहीं गलत तरीके से वापस की गई और कुछ मामलों में राशि वापस ही नहीं की गई।
फीस की कम या अधिक वसूली, लंबित समाधान तथा वस्तु एवं सेवा कर के सही तरीके से लगाए या सरकार को प्रेषित नहीं किए जाने से संबंधित मामले भी लेखापरीक्षा में दर्ज किए गए।

लॉग और पासवर्ड व्यवस्था भी जांच के घेरे में
ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली में यूजर गतिविधियों की निगरानी से संबंधित नियंत्रण भी पर्याप्त मजबूत नहीं पाए गए। अपूर्ण लॉग, बिना लॉगिन के किए गए कार्य और असंगत लॉगिन टाइम-स्टैम्प जैसी स्थितियां सामने आईं।

भूमिका निर्माण और कर्तव्यों के पृथक्करण में भी विसंगतियां मिलीं। इसके अतिरिक्त निर्धारित और प्रभावी पासवर्ड नीति का अभाव सिस्टम सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बिंदु रहा। रिपोर्ट का दूसरा अध्याय आबकारी विभाग की लाइसेंस प्रबंधन, शराब उत्पादन और वितरण प्रणाली से संबंधित है। यहां लेखापरीक्षा का फोकस इस बात पर था कि क्या सूचना प्रणाली में आबकारी अधिनियम, राज्य आबकारी नीतियों, नियमों और सिस्टम रिक्वायरमेंट के अनुरूप पर्याप्त नियंत्रण मौजूद हैं।

कैग ने पाया कि सभी प्रकार के लाइसेंसों के लिए एंड-टू-एंड डिजिटल कार्यक्षमता उपलब्ध नहीं थी। खुदरा बिक्री के अलावा अन्य लाइसेंसों के जारी करने और नवीनीकरण की गतिविधियों की पूरी ऑडिट ट्रेल की समीक्षा या निगरानी नहीं की जा सकी।

बार लाइसेंस में महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज करने की सुविधा नहीं
सिस्टम में बार लाइसेंस से जुड़े होटल की स्टार रेटिंग, अतिरिक्त संचालन बिंदु, अनुमति प्राप्त समय और विस्तारित समय जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।
इसके कारण सिस्टम लाइसेंस फीस की सही गणना और देय तथा भुगतान की गई राशि के बीच अंतर की पहचान नहीं कर पाया। नतीजतन विभाग को कई मामलों में मैनुअल रजिस्टरों पर निर्भर रहना पड़ा।

अस्थायी लाइसेंस में समयसीमा नियंत्रण कमजोर
सेवा का अधिकार अधिनियम के तहत अस्थायी लाइसेंस जारी करने के लिए निर्धारित समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने वाले आवश्यक नियंत्रण सिस्टम में नहीं थे। इसके परिणामस्वरूप कुछ आवेदन लंबित रहे, निपटारे में देरी हुई और निर्धारित कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी मंजूरियां दिए जाने की स्थिति सामने आई।
सिस्टम में प्रभावी एस्केलेशन मैकेनिज्म का अभाव भी सेवा वितरण की निगरानी को प्रभावित करने वाला कारक रहा।

शराब उत्पादन और ईएनए पर मैनुअल रिकॉर्ड का जोखिम
विनिर्माण इकाइयों में उत्पादन प्रक्रिया पूरी तरह स्वचालित नहीं थी। एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ईएनए) के इस्तेमाल, उत्पादन और अपशिष्ट से संबंधित महत्वपूर्ण रिकॉर्ड मैनुअल तरीके से रखे गए।
कैग के अनुसार ऐसी व्यवस्था में त्रुटि, गलत रिपोर्टिंग और हेरफेर की संभावना बढ़ सकती है। ईएनए के परिवहन के लिए परमिट और पास भी सूचना प्रणाली के बाहर मैनुअल रूप से जारी किए गए।

रासायनिक परीक्षण से पहले शराब की आपूर्ति का जोखिम
शराब के बैचों की रासायनिक परीक्षण रिपोर्ट के विवरण दर्ज करने की सुविधा सिस्टम में नहीं थी। इससे परीक्षण परिणाम प्राप्त होने से पहले ही शराब भेजे जाने की संभावना बनी रही।
होलोग्राम के सीरियल नंबर को आबकारी पास से मैप करने की सुविधा का भी अभाव था। इससे परिवहन के दौरान शराब की प्रामाणिकता सत्यापित करने की प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता सीमित हुई और विचलन अथवा नकली आपूर्ति का जोखिम बढ़ा।

राजस्व पर भी पड़ा नियंत्रणों की कमजोरी का असर
कई मदों में करोड़ों रुपये की कम वसूली कैग की रिपोर्ट में सिस्टम नियंत्रणों की कमजोरियों से जुड़े कई राजस्व प्रभाव सामने आए। बोतलबंदी फीस और निर्यात शुल्क की कम गणना एवं कम वसूली से क्रमशः ₹2.41 करोड़ और ₹22.26 लाख की राजस्व हानि दर्ज की गई।

लाइसेंसधारकों को शराब की आपूर्ति को मूल या अतिरिक्त कोटे के रूप में स्वयं वर्गीकृत करने की अनुमति दिए जाने से ₹10.37 करोड़ के अतिरिक्त आबकारी शुल्क की कम वसूली हुई।
वहीं, मूल अथवा पुनर्वैधित परमिटों के मुकाबले शराब की कुल आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त सिस्टम चेक नहीं होने से 56,87,810 प्रूफ लीटर शराब की अधिक आपूर्ति हुई। इससे ₹6.93 करोड़ के आबकारी शुल्क का कम उद्ग्रहण हुआ।

स्टॉक और शुल्क गणना में ऑटोमेशन की कमी
स्टॉक ट्रांसफर फीस और अंतर आबकारी शुल्क की स्वचालित गणना की सुविधा नहीं होने से मानवीय त्रुटियों की स्थिति बनी और ₹0.82 करोड़ के शुल्क का कम उद्ग्रहण हुआ।
एल-1बीएफ और एल-2बीएफ लाइसेंसधारकों द्वारा निर्धारित कोटे से कम शराब उठाने पर सिस्टम पेनल्टी की गणना नहीं कर सका। इसके परिणामस्वरूप ₹17.27 करोड़ की पेनल्टी नहीं लगाई जा सकी। विलंबित भुगतान पर ब्याज की स्वचालित गणना की सुविधा भी नहीं थी। निरीक्षण प्रक्रिया के स्वचालित न होने से न्यूनतम ₹12.46 करोड़ की पेनल्टी के कम उद्ग्रहण का मामला सामने आया।

ट्रेजरी भुगतान और कॉर्पस खाते में भी नियंत्रण संबंधी कमियां
सिस्टम ने लाइसेंसधारकों के कॉर्पस खाते में उपलब्ध राशि से अधिक आबकारी शुल्क समायोजित करने की अनुमति दी। इससे ₹38.81 करोड़ के अतिरिक्त उपयोग की स्थिति बनी।
ट्रेजरी चालानों के दोहरे इस्तेमाल से लाइसेंसधारकों को ₹1.54 करोड़ का अतिरिक्त क्रेडिट मिला। ई-ग्रास में लंबित चालानों के बदले ₹2.05 करोड़ का लाभ दिए जाने से ऐसी राशि के इस्तेमाल की स्थिति बनी, जो वास्तव में खजाने में जमा नहीं हुई थी।

वास्तविक ट्रेजरी प्रेषण से अधिक ₹12.19 करोड़ का अतिरिक्त क्रेडिट भी कमजोर सत्यापन नियंत्रणों के कारण संभव हुआ। इसके अलावा अन्य लेखा शीर्षों से संबंधित चालानों को स्वीकार किए जाने से कॉर्पस खातों में ₹5.22 करोड़ का गलत क्रेडिट संभव हुआ।

साइबर सुरक्षा और आपदा प्रबंधन पर भी ध्यान जरूरी
प्रशिक्षण, बीसीपी और डीआरपी में कमियां कैग ने विभागीय तकनीकी कर्मचारियों के अनिवार्य प्रशिक्षण की कमी को भी महत्वपूर्ण माना। इसके कारण सिस्टम इंटीग्रेटर पर विभाग की निरंतर निर्भरता बनी रही। विभाग राज्य के दिशा-निर्देशों के अनुरूप बिजनेस कंटिन्युइटी प्लान (बीसीपी) और डिजास्टर रिकवरी प्लान (डीआरपी) तैयार करने में भी विफल रहा। अनिवार्य सुरक्षा लेखापरीक्षा अथवा साइबर सुरक्षा मूल्यांकन का प्रमाण उपलब्ध नहीं कराया जा सका।

डिजिटल शासन के लिए नियंत्रण मजबूत करने की जरूरत
कैग की रिपोर्ट का व्यापक संदेश यह है कि केवल सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन कर देना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल व्यवस्था की सफलता के लिए एंड-टू-एंड ऑटोमेशन, मजबूत सत्यापन, ऑडिट ट्रेल, भूमिका आधारित एक्सेस, डेटा की शुद्धता, वित्तीय नियंत्रण, नियमित सुरक्षा ऑडिट और प्रशिक्षित मानव संसाधन भी जरूरी हैं।

ई-प्रोक्योरमेंट में जहां निविदा प्रक्रिया और डेटा विश्वसनीयता से जुड़े मुद्दे सामने आए, वहीं आबकारी प्रणाली में लाइसेंस से लेकर उत्पादन, स्टॉक, परिवहन, शुल्क वसूली और ट्रेजरी समायोजन तक कई स्तरों पर सिस्टम आधारित नियंत्रणों को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित हुई है। इस लिहाज से रिपोर्ट केवल तकनीकी कमियों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि डिजिटल प्रशासन में प्रक्रियागत अनुशासन, वित्तीय जवाबदेही और साइबर सुरक्षा को साथ लेकर चलने की जरूरत को सामने रखती है।

 

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