Edited By Isha, Updated: 28 Oct, 2026 09:11 AM
डिजिटल दौर में मरीजों तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया, वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों तथा अस्पतालों को अब प्रचार के मामले में अधिक सतर्क रहना होगा। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की...
चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी): डिजिटल दौर में मरीजों तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया, वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों तथा अस्पतालों को अब प्रचार के मामले में अधिक सतर्क रहना होगा। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की नई गाइडलाइन के तहत चिकित्सा सेवाओं के प्रचार में भ्रामक दावों, फर्जी ऑनलाइन समीक्षाओं और मरीजों को आकर्षित करने के लिए अपनाए जाने वाले अनुचित तरीकों पर रोक लगाने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता बनाए रखना और मरीजों को भ्रामक जानकारी के आधार पर इलाज चुनने से बचाना है।
नई व्यवस्था के तहत डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों को अपनी योग्यता, उपलब्ध सुविधाओं और सेवाओं की जानकारी देते समय तथ्यों का ध्यान रखना होगा। सोशल मीडिया पोस्ट, डिजिटल विज्ञापन, वेबसाइट और इन्फ्लुएंसर के माध्यम से ऐसे दावे नहीं किए जा सकेंगे, जिनसे मरीजों के मन में इलाज की सफलता को लेकर गलत उम्मीद पैदा हो। ‘नंबर-1 डॉक्टर’, ‘100 प्रतिशत सफलता’, ‘गारंटीड इलाज’ और ‘चमत्कारी उपचार’ जैसे प्रचारात्मक दावे इसी दायरे में आएंगे।
फर्जी रिव्यू और ऑनलाइन रेटिंग में हेरफेर भी निशाने पर
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपनी छवि बेहतर दिखाने के लिए फर्जी मरीजों की समीक्षाएं, कृत्रिम लाइक, रेटिंग बढ़ाने के अनुचित तरीके और सर्च रैंकिंग में हेरफेर करने जैसी गतिविधियों को भी नियमों के दायरे में रखा गया है। इसी तरह, डिजिटल प्रचार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार ऐसी सामग्री का इस्तेमाल भी स्वीकार्य नहीं होगा, जो मरीजों को गुमराह करती हो या चिकित्सा सेवाओं के बारे में गलत धारणा बनाती हो।
चिकित्सा क्षेत्र में ऑनलाइन प्रचार का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में मरीजों के लिए यह समझना जरूरी है कि इंटरनेट पर अधिक लोकप्रिय दिखाई देने वाला डॉक्टर या अस्पताल जरूरी नहीं कि हर बीमारी के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प हो। इलाज का चयन चिकित्सक की मान्य योग्यता, विशेषज्ञता, पंजीकरण और मरीज की चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर होना चाहिए।
क्लिनिक और सेवाओं की जानकारी देने पर रोक नहीं
नई गाइडलाइन का अर्थ यह नहीं है कि डॉक्टर सोशल मीडिया या इंटरनेट पर अपनी प्रैक्टिस से संबंधित जानकारी साझा नहीं कर सकेंगे। चिकित्सक अपने क्लिनिक की शुरुआत, स्थान में बदलाव, परामर्श शुल्क और उपलब्ध सेवाओं से जुड़ी तथ्यात्मक जानकारी दे सकते हैं। अस्पताल भी अपने विभागों, डॉक्टरों की मान्य योग्यताओं, पंजीकरण, उपलब्ध उपकरणों, आपातकालीन सेवाओं, मान्यता, शुल्क और संपर्क विवरण को सार्वजनिक कर सकेंगे।
डॉक्टर स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों, शैक्षणिक चर्चाओं और जनस्वास्थ्य अभियानों में भी भाग ले सकते हैं। हालांकि, जानकारी देने और मरीजों को आकर्षित करने के लिए स्वयं का प्रचार करने के बीच अंतर बनाए रखना होगा। स्वास्थ्य संबंधी सामग्री का उद्देश्य मरीजों को सही जानकारी देना होना चाहिए, न कि अप्रमाणित दावों के सहारे चिकित्सा सेवाओं की बिक्री बढ़ाना।
मरीजों की तस्वीरों और मेडिकल रिकॉर्ड के इस्तेमाल पर भी सावधानी
मरीजों की पहचान उजागर करने वाली तस्वीरें, वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड और इलाज से संबंधित विवरण सार्वजनिक करने के मामले में भी विशेष सतर्कता जरूरी होगी। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल लागू कानूनों, आवश्यक सहमति और गोपनीयता संबंधी सुरक्षा उपायों के अनुरूप ही किया जा सकता है। मरीज की सहमति मिल जाने भर से हर तरह का प्रचार स्वतः वैध नहीं हो जाता। अस्पतालों और डॉक्टरों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मरीज की निजता सुरक्षित रहे और किसी व्यक्ति की बीमारी या उपचार की जानकारी का इस्तेमाल अनुचित व्यावसायिक लाभ के लिए न हो।
उल्लंघन पर चेतावनी से पंजीकरण निलंबन तक की कार्रवाई
गाइडलाइन के तहत नियमों का उल्लंघन करने वाले डॉक्टरों के विरुद्ध संबंधित राज्य मेडिकल काउंसिल कार्रवाई कर सकती है। उल्लंघन की प्रकृति और गंभीरता के अनुसार चेतावनी, नैतिकता संबंधी अनिवार्य प्रशिक्षण, निंदा, आर्थिक दंड और पंजीकरण निलंबन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
उल्लंघन दोहराने या गंभीर मामला सामने आने पर तीन से छह महीने अथवा छह से 12 महीने तक पंजीकरण निलंबित करने और बार-बार नियम तोड़ने की स्थिति में एक से तीन वर्ष तक मेडिकल रजिस्टर से नाम हटाने जैसी कार्रवाई का प्रावधान बताया गया है। हालांकि, कार्रवाई संबंधित नियमों और मामले की परिस्थितियों के अनुसार होगी।
डॉक्टर को कार्रवाई से पहले कारण बताओ नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। निर्णय से असंतुष्ट चिकित्सक निर्धारित प्रक्रिया के तहत 60 दिन के भीतर एनएमसी के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड में अपील कर सकता है।
पंजीकृत डॉक्टरों के साथ गैर-पंजीकृत लोगों पर भी कार्रवाई की मांग
नई गाइडलाइन को लेकर पंजीकृत चिकित्सकों के बीच चर्चा शुरू हो गई है। डॉक्टरों का कहना है कि चिकित्सा क्षेत्र में भ्रामक दावों पर रोक लगना जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बिना मान्य पंजीकरण के इलाज का दावा करने वाले लोग भी नियामक कार्रवाई के दायरे में आएं।
चिकित्सकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब कुछ गैर-पंजीकृत लोग सोशल मीडिया पर शत-प्रतिशत इलाज का दावा करते हुए दवाइयों का प्रचार और बिक्री करते हैं, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई की व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी। उनका मानना है कि मरीजों की सुरक्षा के लिए नियमों का पालन सभी संबंधित लोगों से कराया जाना चाहिए।
जागरूकता अभियान जारी रख सकते हैं डॉक्टर
हरियाणा में आईएमए से जुड़ी डॉ. सुशीला सोनी, अध्यक्ष, आईएमए हरियाणा, के अनुसार, डॉक्टरों के लिए सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाने पर प्रतिबंध नहीं है। चिकित्सक लोगों को बीमारियों, बचाव, उपचार के विकल्पों और स्वस्थ जीवनशैली के बारे में जानकारी दे सकते हैं। जरूरी यह है कि ऐसी सामग्री तथ्यपरक हो और उसका इस्तेमाल भ्रामक दावों या स्वयं के अनुचित प्रचार के लिए न किया जाए।
नई गाइडलाइन से चिकित्सा क्षेत्र में डिजिटल संवाद और प्रचार के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने की कोशिश की गई है। इससे मरीजों को अधिक भरोसेमंद जानकारी मिलने और ऑनलाइन प्रचार के नाम पर किए जाने वाले अतिरंजित दावों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।