Edited By Isha, Updated: 01 Feb, 2026 11:30 AM

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि जीवन का अधिकार केवल 'पशुवत अस्तित्व' तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 'गरिमापूर्ण और सार्थक जीवन जीने' का अधिकार भी शामिल है, साथ ही एक महिला को
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि जीवन का अधिकार केवल 'पशुवत अस्तित्व' तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 'गरिमापूर्ण और सार्थक जीवन जीने' का अधिकार भी शामिल है, साथ ही एक महिला को उसके पति द्वारा 2 अलग-अलग नियोक्ताओं के अधीन दी गई सेवा अवधियों के लिए दोहरी पारिवारिक पैंशन प्राप्त करने की अनुमति दी गई है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ एक सरकारी कर्मचारी की विधवा जिसे की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, उसके पति की सेवा अवधि के एक हिस्से के लिए पारिवारिक पेंशन देने से इंकार कर दिया गया था।
विधवा ने इस इंकार को पारिवारिक पेंशन योजना, 1964 के विपरीत बताते हुए चुनौती दी थी। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा कि पारिवारिक पेंशन एक 'प्राकृतिक अधिकार' है जो पहले से दी जा रही पैंशन से प्राप्त होता है और कोई भी नियम या निर्देश इस अधिकार को छीन नहीं सकता।
अदालत ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन का अधिकार केवल पशुवत अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सार्थक जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है, जिसमें गरिमा का सही अर्थों में समावेश है। याचिकाकर्ता के पति अपने जीवनकाल के दौरान 2 आनुपातिक पैंशन प्राप्त कर रहे थे। एक शहरी संपदा विभाग से 1963 से 1978 तक प्रदान की गई सेवा के लिए और दूसरी हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एच.एस. वी.पी.) से 1978 से 2003 तक प्रदान की गई सेवा के लिए।
1977 के सरकारी निर्देश, जिनमें कहा गया है कि जब किसी सरकारी कर्मचारी को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में शामिल किया जाता है, तो पैंशन और पारिवारिक पेंशन के लिए सरकार की देयता समाप्त हो जाएगी, केवल भविष्य में लागू हो सकते हैं।