Edited By Gaurav Tiwari, Updated: 12 Apr, 2026 05:26 PM

कृष्णांजलि सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स में गौरी और अशोक स्वामिनाथन की बेटी, स्मिति अय्यर का भरतनाट्यम अरंगेत्रम (मंच-प्रवेश) संपन्न हुआ।
गुड़गांव ब्यूरो: कृष्णांजलि सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स में गौरी और अशोक स्वामिनाथन की बेटी, स्मिति अय्यर का भरतनाट्यम अरंगेत्रम (मंच-प्रवेश) संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम नई दिल्ली के मयूर विहार स्थित कार्थ्यानी सामाजिक-सांस्कृतिक परिसर में आयोजित किया गया। इस युवा नृत्यांगना के जीवन के इस ऐतिहासिक क्षण को देखने के लिए उनके दोस्तों, परिवार वालों सहित दिल्ली व आस-पास के दर्शक मौजूद रहे। गुरु डॉ. राजेश्वरी मेनन के सानिध्य में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली स्मिति अय्यर ने अत्यंत गरिमा और आत्मविश्वास के साथ अपना एकल नृत्य प्रस्तुत किया। यह प्रदर्शन उनके ’अरंगेत्रम’ का प्रतीक था- एक ऐसा अवसर जो भरतनाट्यम नर्तक के लिए गहन तैयारी और अभ्यास की लंबी अवधि के बाद मंच पर उसके औपचारिक पदार्पण का सूचक होता है। यह प्रदर्शन इस शास्त्रीय नृत्य शैली में महारत हासिल करने के प्रति उनके जुनून और अथक प्रयासों का ही परिणाम था।
उनके प्रदर्शन की शुरुआत ’पुष्पांजलि’ से हुई, जिसके माध्यम से उन्होंने दर्शकों का स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने ’अलारिपु’ प्रस्तुत किया, जो लय और शारीरिक तालमेल पर उनकी अद्भुत पकड़ का एक बेहतरीन प्रदर्शन था। तत्पश्चात, उन्होंने भावों से ओत-प्रोत होकर ’गणेश स्तुति’ और ’सरस्वती कीर्तनम’ प्रस्तुत किए। इस प्रस्तुति का एक अविस्मरणीय क्षण ’राग कल्याणी’ में प्रस्तुत ’वर्णम’ था, जिसमें स्मिति ने ’नृत्त’ (शुद्ध नृत्य) और ’अभिनय’ (भाव-प्रदर्शन) के अद्भुत मेल के माध्यम से अपनी सहनशक्ति और कला की गहराई, दोनों का ही शानदार प्रदर्शन किया। ’मुरुगन कीर्तनम’, ’कल्याण राम’ और ’कनक सभाई’ में भी उनकी प्रस्तुतियाँ उतनी ही प्रशंसनीय थीं, जिनमें उन्होंने भक्ति के विभिन्न स्वरूपों को जीवंत कर दिया। प्रदर्शन के उत्तरार्ध का एक और उल्लेखनीय तत्व ’जगन्मोहनाने’ था, जिसमें उन्होंने भगवान कृष्ण के नटखट स्वरूप को प्रस्तुत किया; वहीं ’श्री चक्र राजा’ के माध्यम से उन्होंने आदि-शक्ति के दिव्य स्त्री-स्वरूप को नमन किया। इन प्रस्तुतियों के बाद, उन्होंने अत्यंत ऊर्जा के साथ ’तिल्लाना’ और अंत में पारंपरिक ’मंगलम’ प्रस्तुत किया।
स्मिति के इस प्रदर्शन में अनुभवी कलाकारों के एक समूह ने उनका बखूबी साथ निभाया। ’नट्टुवांगम’ (ताल-संचालन) के लिए गुरु डॉ. राजेश्वरी मेनन ने संगत की; गायन में गुरु इलांगोवन गोविंदराजन ने सहयोग दिया, जबकि पी. वेत्रिभूति ने मृदंगम, रघुरामन गोविंदराजन ने बांसुरी और दिल्ली आर. श्रीधर ने वायलिन पर उन्हें संगत दी। स्मिति अय्यर ने अपने अरंगेत्रम के अनुभव साझा किए। उन्होंने माना कि अपने पहले पूर्ण एकल प्रदर्शन की तैयारी करते समय उन्हें घबराहट और खुशी का मिला-जुला अनुभव हो रहा था। हालाँकि, जैसे ही उन्होंने मंच पर कदम रखा, दर्शकों के प्यार और समर्थन से वे अभिभूत हो गईं। गुरु के मातृत्व भरे आशीर्वाद और दर्शकों की सराहना ने प्रदर्शन के दौरान उन्हें आत्मविश्वास से भर दिया। उन्हें एहसास हुआ कि वर्षों की कड़ी मेहनत आखिरकार रंग लाई है। गुरु डॉ. राजेश्वरी मेनन ने अपनी शिष्या की उपलब्धि पर गर्व व्यक्त किया। उन्होंने स्वीकार किया कि इस कला रूप में महारत हासिल करने के प्रति शिष्या का पूरा समर्पण, निष्ठा और प्रयास उनके प्रदर्शन में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। उनका मानना था कि स्मिति सीखना जारी रखेगी, एक नृत्यांगना के रूप में आगे बढ़ेगी, और भरतनाट्यम की गौरवशाली परंपरा और विरासत को जीवित रखेगी। अरंगेत्रम का यह कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा, क्योंकि इसने स्मिता अय्यर के एक स्वतंत्र भरतनाट्यम कलाकार के रूप में करियर की शुरुआत की, जिस पर उनकी गुरु, परिवार के सदस्यों और दर्शकों का भरपूर आशीर्वाद बरसा।