खेम राज सुंदरियाल को पद्मश्री सम्मान, पानीपत के हाथकरघा उद्योग के संरक्षक बने गौरव

Edited By Manisha rana, Updated: 30 Jan, 2026 04:29 PM

khem raj sundariyal awarded padma shri

भारत सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कार 2026 की सूची में हरियाणा के पानीपत निवासी श्री खेम राज सुंदरियाल का नाम पद्मश्री के लिए शामिल किया गया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें हाथकरघा बुनाई के क्षेत्र में 60 वर्षों से...

चंडीगढ़ (धरणी) : भारत सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कार 2026 की सूची में हरियाणा के पानीपत निवासी श्री खेम राज सुंदरियाल का नाम पद्मश्री के लिए शामिल किया गया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें हाथकरघा बुनाई के क्षेत्र में 60 वर्षों से अधिक के असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया जा रहा है। विशेष रूप से जामदानी और टेपेस्ट्री तकनीकों के संरक्षण, नवाचार तथा हजारों बुनकरों को प्रशिक्षण देकर रोजगार सृजन में उनके महत्वपूर्ण कार्य को मान्यता दी गई है।

इस उपलब्धि पर गांधी ग्लोबल फैमिली (GGF) के महासचिव राम मोहन राय, नरेंद्र ऋषि, इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स के प्रांतीय उपाध्यक्ष पवन कुमार सैनी तथा कौमी एकता मंच के संयोजक संजय कुमार सहित अन्य सदस्यों ने उनके निवास पर पहुंचकर हार्दिक बधाई दी। GGF से उनका 30 वर्षों का जुड़ाव रहा है। संगठन ने इसे उनके अथक परिश्रम, नवाचार और सामाजिक योगदान की सार्थक मान्यता बताया।

सुंदरियाल (जन्म: 1943, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुमाड़ी गांव) ने एक साधारण किसान परिवार में जन्म लिया, लेकिन खेती के बजाय बुनाई को अपना जीवन मिशन बनाया। उन्होंने 1962-64 में श्रीनगर गढ़वाल के सरकारी आईटीआई से हैंडलूम टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा पूरा किया। 1966 में वीवर्स सर्विस सेंटर (कपड़ा मंत्रालय) में शामिल होने के बाद वे पानीपत पहुंचे, जहां उन्होंने विभाजन के बाद आए प्रवासी बुनकरों के साथ काम किया।

पानीपत में आने पर उन्होंने स्थानीय बुनकरों को केवल साधारण खेस, बेडशीट और पर्दे बनाने से आगे बढ़ाया। जामदानी और टेपेस्ट्री तकनीकों को पुनर्जीवित किया, पॉलिएस्टर यार्न का उपयोग शुरू किया, रंगाई में सुधार लाए और नए डिजाइन विकसित किए। इससे पानीपत का हाथकरघा उद्योग निर्यात हब बन गया। उन्होंने हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों के हजारों अप्रशिक्षित बुनकरों को प्रशिक्षित किया। सेवानिवृत्ति के बाद स्थापित सहकारी समिति आज भी 25 से अधिक बुनकरों को वार्षिक प्रशिक्षण और रोजगार दे रही है, जिससे कुल 1000 से अधिक परिवार लाभान्वित हुए हैं।

उन्होंने एम.एफ. हुसैन जैसी हस्तियों की पेंटिंग्स को टेपेस्ट्री में उतारा और पानीपत खेस को नए रूप दिए। उनका मानना है, "कार्य ही सबसे बड़ा धर्म है।" इस सम्मान से पानीपत के 700 वर्ष पुराने हाथकरघा उद्योग के उन सभी बुनकरों को भी श्रद्धांजलि दी गई है जिनकी मेहनत ने इस शहर को विश्व पटल पर स्थापित किया। सुंदरियाल का यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पारंपरिक हस्तशिल्प को जीवित रखने और ग्रामीण रोजगार सृजन के प्रेरक उदाहरण के रूप में उभरेगा। हम उन्हें पुनः हार्दिक बधाई देते हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।

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