इन मंदिरों के करें दर्शन, कालसर्प दोष से मिलेगी मुक्ति

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Sunday, April 9, 2017-4:49 PM

श्री लूत काल हस्तीश्वर 
दक्षिण भारत के विश्व प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर के पास, लगभग पचास किलोमीटर पर, काल हस्ती शिव मंदिर है। यहां भगवान शिव के एकादश रुद्रावतारों में प्रथम व द्वितीय स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। यहां कालसर्प योग की शांति का उपाय विधि-विधान  से किया जाता है। वहां लगभग एक घंटे की पूजा-अर्चना के साथ मंदिर प्रांगण में ही पुरोहित वैदिक रीति से शांति कराते हैं। मंदिर प्रवेश के साथ ही इस पूजा के फल, कुछ दक्षिणा देने से प्राप्त हो जाते हैं। तदुपरांत पूजा-अर्चना कराई जाती है।
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त्र्यम्बकेश्वर  
नासिक के पास त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिग पर भी कालसर्प की शांति का विधान है। त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिग पर भी अभिषेक और पूजा-अर्चना करा कर, नाग-नागिन के जोड़े छोड़ने से कालसर्प पितृदोष की शांति हो जाती है।
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प्रयाग संगम
इलाहाबाद में संगम पर भी कालसर्प, पितृदोष की शांति के लिए नाग-नागिन की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कराकर, पूजन करके दूध के साथ संगम में प्रवाहित करना चाहिए। तीर्थराज प्रयाग में कालसर्प दोष की शांति के लिए संगम में तर्पण, श्राद्ध भी कर लेना चाहिए।
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त्रियुगीनारायण मंदिर 
उत्तरांचल राज्य में द्वादश ज्योतिर्लिग श्री केदारनाथ से 15 कि.मी. पहले त्रियुगीनारायण मंदिर के प्रांगण में चांदी+ तांबा एवं स्वर्ण+चांदी अथवा तांबे का नाग-नागिन (बच्चों सहित 2-3 छोटे नाग) अर्पित करने एवं प्राचीन काल से जल रही धूनी (अग्नि) में चंदन लकड़ी, गूलर और पीपल की लकड़ी अर्पित करने से भी कालसर्प दोष शांत होकर शुभ फल देता है।

विशेष : त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि शिव-पार्वती का विवाह इसी स्थान पर हुआ था और विवाह के समय जो अग्नि प्रज्वलित हुई थी वह आज भी जल रही है। उस पवित्र हवन में जो भक्तगण दर्शन के समय लकड़ी खरीदकर उसमें डालते हैं, उनकी मनोकामना पूर्ण होती है, ऐसा विश्वास है।

त्रिनागेश्वरम् वासुकि नाग 
दक्षिण भारत के तंजौर जिले के अंतर्गत त्रिनागेश्वरम नाग (राहू) मंदिर में राहू काल में राहू का अभिषेक कराने का भी विधान है। यहां प्रतिदिन राहू काल में अभिषेक किया जाता है।
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बद्रीनाथ धाम 
चारों धामों में एक बद्रीनाथ में भी पितृदोष कालसर्प की शांति बहुत ही विधि-विधान से कराई जाती है। यहीं पर ब्रह्म कपाल नामक स्थान पर शिव जी द्वारा ब्रह्मा के जिस मुंड को काटा गया था उसे मुक्ति प्रदान कर गले में लटके ब्रह्म मुंड से मुक्ति पाई थी। 
 

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