Edited By Krishan Rana, Updated: 29 Sep, 2026 07:12 PM

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 से 2014 के बीच संविदा आधार पर नियुक्त आईटीआई इंस्ट्रक्टरों के नियमितीकरण के
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 से 2014 के बीच संविदा आधार पर नियुक्त आईटीआई इंस्ट्रक्टरों के नियमितीकरण के संबंध में राज्य सरकार को समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दिया है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने सरोज व अन्य की याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित अधिकारी को याचिकाकर्ताओं के कानूनी नोटिस पर 3 महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करने को कहा है।
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा था कि उन्हें निर्धारित चयन प्रक्रिया के बाद स्वीकृत पदों के विरुद्ध आईटीआई इंस्ट्रक्टर के रूप में संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्तियां वर्ष 2011 से 2014 के बीच हुई थीं और वे लगातार बिना किसी सेवा अंतराल के काम कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार वे निर्धारित योग्यता रखते हैं और दस वर्ष से अधिक की निरंतर सेवा पूरी कर चुके हैं।
उन्होंने नियमितीकरण के लिए सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम भारत संघ मामले में दिए फैसले और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जोगिंदर बनाम हरियाणा सरकार मामले में दिए निर्देशों का हवाला दिया। याचिकाकर्ताओं ने नियमितीकरण के साथ वेतन निर्धारण, बकाया राशि और 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज समेत अन्य परिणामी लाभ देने की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि इन नियुक्तियों के लिए सरकार ने 29 जुलाई 2010 को चयन मापदंड तय किए थे, जिन्हें बाद में 18 अप्रैल 2011 और 30 मार्च 2016 के पत्रों के माध्यम से संशोधित किया गया।
बाद में पारदर्शिता और योग्यता सुनिश्चित करने के लिए साक्षात्कार का प्रावधान भी हटा दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि नियमितीकरण के संबंध में उन्होंने 14 जुलाई 2026 को संबंधित अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा था, लेकिन उस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि फिलहाल वे केवल इतना चाहते हैं कि उनके 14 जुलाई 2026 के कानूनी नोटिस पर संबंधित अधिकारी समयबद्ध तरीके से निर्णय लें। हरियाणा सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने भी इस मांग पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि वह कानूनी नोटिस पर विचार कर याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दें और प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करें।
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