Edited By Krishan Rana, Updated: 15 Jul, 2026 06:08 PM
: "न झुका, न रुका, न बिका"* हरियाणा की राजनीति में जब भी "बेबाकी" और "निर्भीकता" की बात होती है, तो एक नाम सबसे पहले जुबान
चंडीगढ़ (चंद्रशेखर धरणी) : "न झुका, न रुका, न बिका"* हरियाणा की राजनीति में जब भी "बेबाकी" और "निर्भीकता" की बात होती है, तो एक नाम सबसे पहले जुबान पर आता है अनिल विज। एक समय थे जब वे बैंक के काउंटर पर बैठकर पासबुक एंट्री करते थे। आज वही व्यक्ति प्रदेश के सबसे प्रभावशाली कैबिनेट मंत्रियों में से एक हैं और "आयरन मैन" के नाम से जाने जाते हैं।
उनके पास न राजनीतिक विरासत थी, न चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों का खजाना। था तो सिर्फ संगठन के प्रति अटूट समर्पण और जनता के लिए लड़ने का जज्बा। 1990 में पार्टी के एक आदेश ने उनकी जिंदगी बदल दी और हरियाणा की राजनीति को एक ऐसा नेता दिया जो सत्ता को भी आंख दिखाने से नहीं डरता।
सुषमा स्वराज के राज्यसभा जाने से खुला किस्मत का दरवाजा
साल 1990। अंबाला छावनी की विधायक सुषमा स्वराज को भाजपा ने राज्यसभा भेजने का फैसला किया। सीट खाली हुई तो पार्टी ने सर्वे कराया। रिपोर्ट में एक ही नाम आया - अनिल विज।
उस वक्त विज एक बैंक में कर्मचारी थे। राजनीति में सक्रिय थे, संगठन के काम करते थे, लेकिन चुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं था। विज खुद बताते हैं, "मैंने नेतृत्व से कहा कि मेरी नौकरी को 17 साल हुए हैं। 3 साल और रुक जाता तो पेंशन पक्की थी। आर्थिक हालत भी ठीक नहीं थी कि चुनाव लड़ सकूं।"
लेकिन भाजपा का आदेश पत्थर की लकीर था। "तुम्हें ही चुनाव लड़ना है"। अनुशासित कार्यकर्ता होने के नाते विज ने हामी भर दी। बैंक की नौकरी छोड़ दी और मैदान में उतर गए।
पहला चुनाव, पहली जीत और इतिहास
सामने था सत्तारूढ़ दल का मजबूत उम्मीदवार। राजनीतिक पंडित कह रहे थे - "नया लड़का, संसाधन नहीं, कैसे जीतेगा?" लेकिन अंबाला की जनता ने जवाब वोट से दिया। अनिल विज ने पहली ही बार में चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया। इस जीत की गूंज सिर्फ हरियाणा तक नहीं, पड़ोसी राज्यों तक पहुंची।
एक बैंक कर्मचारी से सीधे विधायक बनने का सफर हरियाणा की राजनीति में मिसाल बन गया। यहीं से शुरू हुई "विज" युग की शुरुआत।
विपक्ष का वो शेर, जिससे सरकार भी डरती थी
अनिल विज किसी राजघराने से नहीं आए थे। इसलिए उन्हें अपनी पहचान खुद बनानी थी। और उन्होंने बनाई - तैयारी और बेबाकी से।विधानसभा में विपक्ष के विधायक रहते हुए उनकी कार्यशैली सबसे अलग थी। वे बिना तथ्यों के नहीं बोलते थे। सरकार को आंकड़ों से घेरते थे। भ्रष्टाचार, जनविरोधी नीतियों और प्रशासनिक लापरवाही पर उनकी आवाज सबसे तेज होती थी।
उनकी आक्रामकता कई बार उन्हें सदन से बाहर भी ले गई। मार्शल उन्हें बाहर लेकर गए, लेकिन अगले दिन वे फिर उसी मुद्दे के साथ सदन में खड़े मिले। यही कारण है कि आज भी जब सदन में कोई गंभीर बहस होती है तो सबकी नजर "विज" पर टिक जाती है।
"पहले नौकरी छुड़वाई, फिर पार्टी भी" - 1994 का वो किस्सा
अनिल विज अपने 40 साल के राजनीतिक जीवन की एक घटना आज भी याद करते हैं। साल 1994। अचानक पार्टी नेतृत्व का फोन आया - "इस्तीफा दे दो"। विज हैरान रह गए। उन्होंने पूछा "कारण?" जवाब नहीं मिला। फिर पूछा _"आखिर क्यों?"
विज कहते हैं, "मैंने कहा - पहले मेरी नौकरी छुड़वाई, अब पार्टी भी छुड़वा रहे हो। कम से कम कारण तो बता दो।" लेकिन कारण आज तक नहीं बताया गया।फिर भी संगठन की निष्ठा सर्वोपरि थी। वे उसी समय, उसी कार्यालय में बैठे और एक सादे कागज पर इस्तीफा लिखकर दे दिया। यह घटना उनके अनुशासन और पार्टी के प्रति समर्पण को दिखाती है।
जाति से ऊपर, जनसेवा से बड़ी राजनीति
हरियाणा की राजनीति अक्सर जातिगत समीकरणों पर चलती है। लेकिन अनिल विज ने अपनी राह अलग बनाई।न कोई राजनीतिक बैकग्राउंड, न बड़ा आर्थिक आधार। फिर भी वे लगातार 7 बार विधायक बने। विधायक से विपक्ष के सबसे मुखर नेता बने, फिर कैबिनेट मंत्री। उनका फॉर्मूला साफ था - जनता के बीच रहो, जनता के मुद्दे उठाओ।
आज वे ऊर्जा, परिवहन और श्रम जैसे बड़े विभाग संभाल रहे हैं। भ्रष्ट और कामचोर अधिकारियों पर उनकी सख्ती के चर्चे पूरे प्रदेश में हैं। फाइलों पर देर करने वाले अफसर उनके नाम से ही सतर्क हो जाते हैं। इसी सख्ती के कारण उन्हें "आयरन मैन" कहा जाने लगा।
हर वर्ग की आवाज, बेबाकी बनी सबसे बड़ी ताकत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विज की सबसे बड़ी पूंजी उनकी स्पष्टवादिता है। वे जो सोचते हैं, वही बोलते हैं। पर्दे के पीछे की राजनीति उन्हें नहीं आती।इसी कारण उनकी लोकप्रियता किसी एक जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। गांव से लेकर शहर तक, हर वर्ग में उनके समर्थक हैं। वे लगातार जनता के बीच रहते हैं, समस्याएं सुनते हैं और समाधान के लिए अफसरों को फोन घुमा देते हैं।
वर्ष 2026 में जब उन्होंने एक बीमार भाई को पीजीआई में छोड़कर सड़क पर प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों से संवाद किया, तो यह उनकी उसी जननेता वाली छवि को और मजबूत करता है।
निष्कर्ष: संघर्ष से शिखर तक
अनिल विज की कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो सोचता है कि बिना पैसा और बिना बैकग्राउंड के राजनीति नहीं हो सकती।बैंक की कुर्सी से विधानसभा की कुर्सी तक का सफर उन्होंने सिर्फ दो चीजों के दम पर तय किया - संगठन के प्रति निष्ठा और जनता के प्रति जवाबदेही।
आज हरियाणा की राजनीति में अनिल विज सिर्फ एक मंत्री नहीं हैं। वे उस विचार के प्रतीक हैं जो कहता है कि अगर नीयत साफ हो और हौसला बुलंद हो, तो एक साधारण कार्यकर्ता भी "आयरन मैन" बन सकता है।
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