Edited By Isha, Updated: 03 Oct, 2026 12:51 PM

एशियाई खेलों में सोनीपत की चार बेटियों ने देश का नाम रोशन किया है। ज्योति रुमावत, नेहा गोयल, साक्षी राणा और शिल्पी डबास भारतीय महिला हॉकी टीम का हिस्सा रहीं और भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम में शामिल रहीं। इन्हीं में से एक हैं सोनीपत
सोनीपत (सुशील मोर): एशियाई खेलों में सोनीपत की चार बेटियों ने देश का नाम रोशन किया है। ज्योति रुमावत, नेहा गोयल, साक्षी राणा और शिल्पी डबास भारतीय महिला हॉकी टीम का हिस्सा रहीं और भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम में शामिल रहीं। इन्हीं में से एक हैं सोनीपत की साक्षी राणा, जिन्होंने जाते वक्त परिवार से कहा था इस बार सोना लेकर लौटूंगी। 11 साल की उम्र में हॉकी स्टिक थामने वाली साक्षी ने जूनियर विश्व कप और जूनियर एशिया कप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है।अब एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतकर साक्षी ने परिवार से किया अपना वादा पूरा कर दिया है।
हाथ में हॉकी स्टिक,आंखों में देश के लिए कुछ कर गुजरने का सपना और परिवार से किया एक वादा।साक्षी राणा जब एशियाई खेलों के लिए रवाना हुई थीं, तब उन्होंने अपनी बहन से कहा था।इस बार सोना लेकर लौटूंगी।साक्षी ने मैदान पर अपना पूरा दम लगाया और आखिरकार वह दिन आ गया, जब उनका वादा हकीकत में बदल गया।साक्षी के स्वर्ण पदक जीतते ही परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। चचेरे भाई राकेश का कहना है कि भारतीय महिला हॉकी टीम की इस ऐतिहासिक कामयाबी की खुशी को शब्दों में बयान करना आसान नहीं है।परिवार लंबे समय से साक्षी के संघर्ष और मेहनत को देखता आया है और अब उसकी सफलता पूरे परिवार के लिए गर्व का पल है।
साक्षी ने महज 11 साल की उम्र में हॉकी का सफर शुरू किया था। छोटी उम्र से ही खेल के प्रति उनका जुनून बढ़ता गया। मेहनत के दम पर उन्होंने जूनियर विश्व कप और जूनियर एशिया कप जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया।लगातार बेहतर प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय महिला हॉकी टीम तक पहुंचाया।साक्षी के परिवार ने भी उनके सपने को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिवार ने गांव छोड़कर सोनीपत में बसने का फैसला किया, ताकि बच्चों को खेलों के लिए बेहतर सुविधाएं और माहौल मिल सके। परिवार में खेल का जुनून सिर्फ साक्षी तक सीमित नहीं है। उनके भाई रोहित भी हॉकी खिलाड़ी हैं।
साक्षी की चाची का कहना है कि हर परिवार को अपनी बेटियों को खेलों में आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए।अगर परिवार बेटियों का साथ दे और उन्हें सुविधाएं मिलें, तो वे देश के लिए बड़े मंच पर पदक जीत सकती हैं। साक्षी के हुनर को निखारने में भारतीय हॉकी की दिग्गज कोच प्रीतम सिवाच की भी अहम भूमिका रही है।एक तरफ परिवार का भरोसा दूसरी तरफ कोच की मेहनत और साक्षी की अपनी लगन।इन तीनों ने मिलकर साक्षी को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां आज उनके गले में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक है। जिस बेटी ने जाते वक्त सोना लेकर लौटने का वादा किया था, उसने मैदान पर अपना वादा पूरा कर परिवार को गौरवान्वित कर दिया।