Edited By Isha, Updated: 30 Sep, 2026 02:22 PM

हरियाणा में धान की खेती को लेकर एक हैरान कर देने वाला ट्रेंड और बड़ा प्रशासनिक अंतर देखने को मिला है। प्रदेश में करीब डेढ़ लाख (1.5 लाख) किसानों ने इस बार पारंपरिक पीआर (PR) धान की खेती से किनारा कर लिया है। वहीं दूसरी ओर
चंडीगढ़: हरियाणा में धान की खेती को लेकर एक हैरान कर देने वाला ट्रेंड और बड़ा प्रशासनिक अंतर देखने को मिला है। प्रदेश में करीब डेढ़ लाख (1.5 लाख) किसानों ने इस बार पारंपरिक पीआर (PR) धान की खेती से किनारा कर लिया है। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार के 'मेरी फसल-मेरा ब्योरा' (MFMB) पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों और खेतों की वास्तविक स्थिति में भारी अंतर मिलने से कृषि एवं राजस्व विभाग के हाथ-पांव फूल गए हैं।
विभागीय जांच और भौतिक सत्यापन के दौरान यह गड़बड़ी सामने आई है कि हजारों किसानों ने 'मेरी फसल-मेरा ब्योरा' पोर्टल पर अपनी जमीन में गन्ना, कपास या अन्य वैकल्पिक फसलें दर्ज करवाई थीं। हालांकि, जब अधिकारियों ने धरातल पर जाकर खेतों का निरीक्षण किया, तो वहां पीआर धान की फसल लहलहाती पाई गई। आंकड़ों में इस बड़े हेरफेर के पीछे मंडी में सरकारी खरीद की सीमा और योजनाओं का लाभ उठाने की मंशा बताई जा रही है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में लगभग डेढ़ लाख किसानों द्वारा पीआर धान की खेती छोड़ने या रकबा घटाने के पीछे कई प्रमुख कारण हैं। 'मेरा पानी-मेरी विरासत' योजना के तहत धान की जगह वैकल्पिक फसलें उगाने पर मिलने वाली 7,000 प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि। घटते जलस्तर और बिजली-पानी की बढ़ती लागत के कारण किसानों का बाजरा, मक्का, दलहन और गन्ने की ओर रुझान। पीआर किस्मों में बीमारियों का बढ़ता प्रकोप और बासमती किस्मों के मुकाबले कम मुनाफा।
पोर्टल और धरातल के आंकड़ों में मिले इस विरोधाभास के बाद सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने सभी जिलों के अधिकारियों को खेतों में जाकर 'क्रॉप वेरिफिकेशन' तेज करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि फर्जी या गलत पंजीकरण कराने वाले किसानों का डेटा दुरुस्त किया जाएगा, ताकि सरकारी खरीद और डीबीटी (DBT) भुगतान के समय किसी प्रकार की अनियमितता न हो।