RTE एक्ट के तहत तीन साल के बच्चे को EWS कोटे में दाखिला देगा निजी स्कूल, अदालत ने जारी किए आदेश

Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 30 Sep, 2026 10:38 PM

court ordered to private school to give admission under ews

शिक्षा के अधिकार (आरटीई एक्ट 2009) के तहत आवंटित सीट पर बच्चे को दाखिला न देना एक निजी स्कूल को भारी पड़ गया है। गुरुग्राम की अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत डॉ. गगन गीत कौर ने फैसला सुनाते हुए सुशांत लोक में स्थित निजी स्कूल के उस फैसले को खारिज कर...

गुड़गांव,(ब्यूरो): शिक्षा के अधिकार (आरटीई एक्ट 2009) के तहत आवंटित सीट पर बच्चे को दाखिला न देना एक निजी स्कूल को भारी पड़ गया है। गुरुग्राम की अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत डॉ. गगन गीत कौर ने फैसला सुनाते हुए सुशांत लोक में स्थित निजी स्कूल के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसके तहत तीन साल के मासूम बच्चे को दाखिला देने से मना कर दिया गया था। अदालत ने स्कूल को कड़ा आदेश देते हुए 15 दिनों के अंदर बच्चे को नर्सरी कक्षा में प्रवेश देने का निर्देश दिया है।

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मामला सेक्टर-44 कन्हई गांव के रहने वाले गजेंद्र के तीन वर्षीय बेटे का है। मौलिक शिक्षा विभाग हरियाणा द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए 29 अप्रैल 2026 को आयोजित आधिकारिक ड्रॉ के जरिए भव्यंश तंवर को उसकी पहली पसंद के आधार पर सुशांत लोक के निजी स्कूल में नर्सरी कक्षा के लिए सीट आवंटित की गई थी। अभिभावकों ने नौ मई 2026 को स्कूल में सभी मूल दस्तावेज जमा करवा दिए थे। स्कूल प्रशासन ने उन्हें 22 मई को बुलाया, लेकिन उस दिन स्कूल ने बच्चे का दाखिला देने से साफ इनकार कर दिया।

 

दाखिला रद्द होने पर जब मामला अदालत पहुंचा, तो स्कूल प्रशासन ने तर्क दिया कि सत्यापन के दौरान बच्चे का निवास स्थान स्कूल से तीन किलोमीटर की सीमा से बाहर पाया गया। स्कूल का कहना था कि दूरी के नियमों के उल्लंघन के कारण दाखिला निरस्त किया गया। इससे पहले सिविल जज (जूनियर डिविजन) गुरुग्राम ने 20 जुलाई 2026 को अंतरिम राहत याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ बच्चे के पिता ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील दायर की। वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि स्कूल की इस मनमानी के कारण एक मई से शुरू हुए शैक्षणिक सत्र का नुकसान बच्चा झेल रहा है, जिससे उसके मानसिक और शैक्षणिक विकास पर बुरा असर पड़ रहा है।

 

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपने 10 पेज के फैसले में स्कूल प्रशासन और ऑनलाइन सिस्टम की खामियों पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब आवेदक फॉर्म भरता है, तो पोर्टल पर ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो केवल पड़ोस के स्कूलों को ही दिखा। कमजोर वर्ग का व्यक्ति नियमों और दूरी की तकनीकी परिभाषाएं नहीं समझ सकता। जब लॉटरी प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो अंत में दूरी का बहाना बनाकर आवेदन खारिज करना आरटीई अधिनियम के कल्याणकारी उद्देश्यों को विफल करता है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह कमजोर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित करने और उन्हें अभिजात वर्ग के बच्चों के साथ पढ़ने से रोकने की एक पैंतरेबाजी के अलावा कुछ नहीं है। एक तरफ देश में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ निजी स्कूलों में कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित सीटें मामूली बहाने बनाकर खाली छोड़ दी जाती हैं। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्य अधिकारियों द्वारा आवंटित बच्चे को निजी स्कूल दाखिला देने से मना नहीं कर सकता और न ही वह आवंटन के फैसले पर खुद समीक्षा बैठा सकता है।

 

अदालत ने माना कि स्कूल को वित्तीय नुकसान हो सकता है जिसकी भरपाई पैसों से संभव है, लेकिन बच्चे के कीमती शैक्षणिक वर्ष का नुकसान पैसों से पूरा नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे अपूरणीय क्षति मानते हुए निचली अदालत का 20 जुलाई का आदेश रद्द कर दिया और वेंटेश्वर स्कूल को 15 दिनों के भीतर बच्चे का प्रवेश सुनिश्चित करने का आदेश जारी कर दिया।

 

 

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