फर्जी परचेज ऑर्डर के नाम पर धोखाधड़ी करने के मामले में आरोपी को अदालत ने किया बरी

Edited By Pawan Kumar Sethi, Updated: 24 Sep, 2026 08:40 PM

court acquits accused in fraud case involving fake purchase orders

कंपनी के नाम पर फर्जी परचेज ऑर्डर बनाकर लाखों रुपये की धोखाधड़ी और गबन करने के नौ साल पुराने मामले में गुरुग्राम अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट विशाल की अदालत ने पर्याप्त साक्ष्यों की कमी और पुलिस जांच में गंभीर...

गुड़गांव, (ब्यूरो): कंपनी के नाम पर फर्जी परचेज ऑर्डर बनाकर लाखों रुपये की धोखाधड़ी और गबन करने के नौ साल पुराने मामले में गुरुग्राम अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट विशाल की अदालत ने पर्याप्त साक्ष्यों की कमी और पुलिस जांच में गंभीर खामियों के चलते आरोपी अनंत जैन को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

गुरुग्राम की ताजा खबरों के लिए लिंक  https://www.facebook.com/KesariGurugram  पर क्लिक करें।

 

जानकारी के मुताबिक, सात अक्तूबर 2016 को गुरुग्राम के बादशाहपुर थाने में मामला दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि वे निर्माण सामग्री की आपूर्ति के सिलसिले में सेक्टर-72 स्थित एक कंपनी में गए थे। वहां उनकी मुलाकात कंपनी के परचेज ऑफिसर अनंत जैन निवासी फगवाड़ा, पंजाब से हुई थी। शिकायत के अनुसार अनंत जैन ने कंपनी की फर्जी ईमेल आईडी का इस्तेमाल कर लकड़ी की आपूर्ति के लिए जाली परचेज ऑर्डर जारी किए और जल्द भुगतान का झांसा देकर उनसे अलग-अलग किस्तों में (नकद व बैंक ट्रांसफर के जरिए) कुल 11 लाख 33 हजार रुपये ऐंठने का आरोप है। जब पीड़ित को कंपनी से भुगतान नहीं मिला, तो ठगी का खुलासा हुआ।

 

शिकायतकर्ता ने चार लाख रुपये नकद देने का दावा किया था, लेकिन वह अपनी आयकर रिटर्न में इस राशि का कोई ब्योरा पेश नहीं कर सका। इसके अलावा, नकद लेनदेन का कोई लिखित बिल या रसीद अदालत में पेश नहीं की गई। कंपनी कर्मचारी की गवाही से खुलासा हुआ कि पुलिस द्वारा जब्त किए गए कथित जाली परचेज ऑर्डर पर आरोपी, कंपनी निदेशक या किसी अन्य व्यक्ति के हस्ताक्षर ही नहीं थे। पुलिस ने कंपनी से दस्तावेज हासिल करने के लिए कोई औपचारिक कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई। इसके अलावा, आरोपी का इकबालिया बयान दर्ज करते समय या बैंक रिकॉर्ड हासिल करते समय कोई भी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह शामिल नहीं किया गया, जो कानूनी नियमों का उल्लंघन है। बचाव पक्ष के वकील एसएस चौहान ने तर्क दिया कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को 7.33 लाख रुपये का व्यक्तिगत लोन दिया था। शिकायतकर्ता ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में स्वीकार किया कि वह आरोपी को 2011 से जानता था, जबकि शुरुआती एफआईआर में उसने इस बात को छुपाया था।  न्यायाधीश विशाल ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि अभियोजन पक्ष को अपना मामला संदेह से परे साबित करना होता है। इस मामले में गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास और पुलिस जांच में बड़ी खामियां पाई गईं। अदालत ने आरोपी अनंत जैन को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

 

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!