हाईकोर्ट ने 25 साल बाद सड़क के लिए जमीन अधिग्रहण को सही ठहराया, जमीन मालिकों को कलेक्टर रेट पर मिलेगा मुआवजा

Edited By Krishan Rana, Updated: 28 Sep, 2026 09:04 PM

after 25 years the high court upheld the acquisition of land for the road land

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यमुनानगर जिला के जगाधरी में सड़क के लिए जमीन अधिग्रहण का 25 साल पुराने में

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यमुनानगर जिला के जगाधरी में सड़क के लिए जमीन अधिग्रहण का 25 साल पुराने में फैसला सुनाकर याचिका का निपटारा कर दिया है। हाईकोर्ट ने अधिग्रहण की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ज़मीन मालिकों को 14 सितंबर, 2026 को लागू कलेक्टर रेट के आधार पर मुआवज़ा दिया जाए।

जस्टिस विकास बहल और जस्टिस दिव्या शर्मा की डिवीजऩ बेंच ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में नाकाम रही कि उसने ज़मीन अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 5-ए के तहत ज़मीन मालिकों को आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार देने से पहले ज़रूरी सोच-विचार किया था। 

कोर्ट ने अधिग्रहण को रद्द करने से इनकार कर दिया क्योंकि इस चरण पर ऐसा करने से "सेक्टर 18 और सेक्टर 18 पार्ट रोड" के निर्माण में "बहुत ज़्यादा देरी" होती, जो काफ़ी हद तक बन चुकी थी और नेशनल हाईवे-73 से जुड़ी हुई थी। यह मामला बेंच के सामने तब आया जब ज़मीन अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4 के साथ-साथ धारा 17(1) और 17(4) के तहत 28 अगस्त, 2001 को जारी नोटिफिकेशन को चुनौती देते हुए दो रिट याचिकाएँ दायर की गईं। धारा 6 के तहत 30 अगस्त, 2001 के नोटिफिकेशन को भी चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दाखिल जवाब, स्टेटस रिपोर्ट या रिकॉर्ड में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है जो 1894 के अधिनियम की धारा 5-ए के प्रावधानों को लागू न करने को सही ठहरा सके। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि नोटिफिकेशन को रद्द करने या याचिकाकर्ताओं की ज़मीन छोडऩे से आने-जाने वालों को बहुत परेशानी और दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और यह जनहित में नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ताओं की प्रॉपर्टी इस तरह से स्थित है कि भले ही एक वैकल्पिक रास्ता मौजूद है, लेकिन सभी यात्रियों के हित में यही होगा कि सडक़ याचिकाकर्ताओं की प्रॉपर्टी से होकर गुजऱे ताकि उसे नेशनल हाईवे 73 से जोड़ा जा सके।

विवादित नोटिफिक़ेशन को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के सामने मौजूद याचिकाकर्ता, जिन्होंने अधिग्रहण की कार्यवाही को चुनौती दी है और 2001 से अपना केस लड़ रहे हैं और जिन्हें माना गया है कि कोई मुआवज़ा नहीं मिला है और जो अभी भी प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा बनाए हुए हैं, वे 2013 के अधिनियम के तहत मुआवज़े के हकदार हैं। 

कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि फ़ैसले की तारीख से लेकर मुआवज़े का असल भुगतान होने तक धारा 30(3) के तहत 12 प्रतिशत ब्याज का भुगतान किया जाए। आकलन का काम दो महीने के भीतर पूरा करने और उसके बाद एक महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया गया है।

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